आज़ादी सिर्फ़ एक दिन का जश्न नहीं, बल्कि शऊर, इंसाफ़ और ज़िम्मेदारी का लगातार अहद है

हर साल जब यौम-ए-आज़ादी आता है तो पूरा मुल्क जश्न के रंग में डूब जाता है। गली-मोहल्लों, स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों में राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाते हैं, राष्ट्रगान गाए जाते हैं, रैलियाँ निकाली जाती हैं और बच्चे वतन से मोहब्बत के नारे लगाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज़ादी सिर्फ़ तक़रीबात और नारों तक महदूद है? हक़ीक़त यह है कि आज़ादी जश्न से कहीं बढ़कर एक लगातार निभाई जाने वाली ज़िम्मेदारी का नाम है।

आज़ादी की तारीख़ कुर्बानी, जद्दोजहद और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मज़ाहमत से भरी हुई है। ज़ुल्म सिर्फ़ जिस्मानी तकलीफ़ देने का नाम नहीं है; किसी के बुनियादी हुक़ूक़ छीन लेना, उसकी आवाज़ दबा देना और उसे ख़ौफ़ के साये में ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर करना भी ज़ुल्म है। ज़ालिम को शायद अपने अमल की शिद्दत का एहसास न हो, लेकिन मज़लूम उसकी तकलीफ़ को हर पल महसूस करता है। ग़ुलामी का दर्द जानने वाला ही आज़ादी की क़ीमत को गहराई से समझ सकता है।

आज़ादी सिर्फ़ किसी मुसल्लत ताक़त से निजात पाने का नाम नहीं, बल्कि आज़ाद फ़िक्र, बाशऊर अमल और ज़िम्मेदार ज़िंदगी का नाम भी है। इंसान को अपने जायज़ ख़यालात का इज़हार करने, सवाल उठाने और सच बोलने का हक़ हासिल हो—यही आज़ादी की असल रूह है। हालांकि आज़ादी का मतलब बेलगाम इख़्तियार नहीं है। यह हम पर ज़िम्मेदारी डालती है कि अपनी आज़ादी के साथ-साथ दूसरों के हुक़ूक़, इज़्ज़त और वक़ार का भी एहतराम करें।

अगर किसी शहरी के दिल में ख़ौफ़ इस क़दर बैठ जाए कि वह अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने से डरने लगे, तो यह भी ग़ुलामी की एक शक्ल है। इसी तरह जहालत ऐसी ग़ुलामी है जिसकी ज़ंजीरें दिखाई नहीं देतीं। जो शख़्स सही और ग़लत में फ़र्क़ न कर सके और बग़ैर सोचे-समझे दूसरों की बातों को क़बूल करता रहे, वह फ़िक्री तौर पर पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सकता।

तालीम वह रोशन चराग़ है जो इंसान को फ़िक्री ग़ुलामी से निकालकर शऊर, ख़ुद-एतमादी और बा-वक़ार ज़िंदगी अता करती है। एक बाशऊर शहरी अपने हुक़ूक़ के साथ अपने फ़रायज़ को भी समझता है। तालीम रोज़गार के मौक़े पैदा करने के साथ-साथ इंसान को समाज के मसाइल पर आवाज़ उठाने का हौसला और इंसाफ़ तक पहुँचने की राह भी दिखाती है।

ग़रीबी, महरूमी और मआशी नाहमवारी भी आज़ादी के मफ़हूम पर बड़े सवाल खड़े करती हैं। जब वसाइल कुछ हाथों तक महदूद हो जाएँ, मौक़े सबके लिए बराबर न रहें या किसी कमज़ोर की मजबूरी से फ़ायदा उठाया जाए, तो समाज में बेचैनी और महरूमी बढ़ती है। जब तक क़ानून की हुक्मरानी, मसावात और अद्ल को अमली ज़िंदगी में मज़बूत नहीं किया जाएगा, तब तक आज़ादी का तसव्वुर मुकम्मल नहीं हो सकता।

आज़ादी की हिफ़ाज़त सिर्फ़ सरहद पर खड़ा सिपाही नहीं करता। उस्ताद ईमानदारी से तालीम दे, डॉक्टर इंसानियत के साथ इलाज करे, सरकारी मुलाज़िम ईमानदारी से अपना फ़र्ज़ अदा करे, सहाफ़ी सच्चाई के साथ क़लम उठाए, मज़दूर मेहनत से काम करे और आम शहरी क़ानून की पाबंदी करे, तो ये सभी आज़ादी के सच्चे मुहाफ़िज़ बन जाते हैं।

हममें से अक्सर लोग आज़ाद माहौल में पैदा हुए हैं, इसलिए मुमकिन है कि हम आज़ादी की असल क़ीमत को पूरी तरह महसूस न कर पाते हों। लेकिन जिन लोगों ने ग़ुलामी की पाबंदियाँ, ख़ौफ़ और महरूमियाँ झेली हैं, वे जानते हैं कि आज़ादी महज़ एक लफ़्ज़ नहीं बल्कि एक अज़ीम नेमत है। नई नस्ल को सिर्फ़ यह बताना काफ़ी नहीं कि आज़ादी कब हासिल हुई; उसे यह भी सिखाना होगा कि आज़ादी की हिफ़ाज़त कैसे की जाती है।

यौम-ए-आज़ादी के मौक़े पर हमें सिर्फ़ यह नहीं सोचना चाहिए कि वतन ने हमें क्या दिया, बल्कि यह भी सवाल करना चाहिए कि हमने वतन को क्या दिया? वतन से मोहब्बत सिर्फ़ परचम को सलाम करने या नारा लगाने से साबित नहीं होती। इसका असल पैमाना ईमानदारी, ज़िम्मेदारी, क़ानून की पाबंदी और समाज की बेहतरी के लिए हमारा अमली किरदार है।

आइए! इस यौम-ए-आज़ादी पर जश्न ज़रूर मनाएँ, मगर साथ ही यह अहद भी करें कि हम जहालत को तालीम से, नाइंसाफ़ी को अद्ल से, बदउनवानी को ईमानदारी और शफ़्फ़ाफ़ियत से, और ख़ौफ़ को शऊर व हौसले से शिकस्त देंगे।

क्योंकि आज़ादी सिर्फ़ एक दिन का जश्न नहीं, बल्कि हर दिन निभाई जाने वाली ज़िम्मेदारी है।