मैदान-ए-जंग से सहाफ़त, तालीम और क़ौमी सियासत तक एक रोशन सफ़र

भारत की आज़ादी की जंग किसी एक मज़हब, जाति, ज़बान या तबक़े तक महदूद नहीं थी। अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ अलग-अलग दौर में होने वाली मुख़ालिफ़त और 19वीं तथा 20वीं सदी में सामने आने वाली क़ौमी तहरीकों में हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ तबक़ों और बिरादरियों ने अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक अहम किरदार अदा किया।

इस अज़ीम जद्दोजहद में मुसलमानों की क़ुर्बानियाँ और ख़िदमात भी हिंदुस्तान की तारीख़ का एक अहम हिस्सा हैं। मुसलमानों में हुक्मरान, सिपाही, उलमा, सहाफ़ी, सियासी रहनुमा, इंक़लाबी, ख़वातीन और आम शहरी शामिल थे, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ मुख़्तलिफ़ तहरीकों और मज़ाहमती जद्दोजहद में हिस्सा लिया।

कुछ लोगों ने मुसल्लह मज़ाहमत का रास्ता अपनाया, कुछ ने पुरअमन और ग़ैर-मुसल्लह तहरीकों में हिस्सा लिया, जबकि कई लोगों ने सहाफ़त, तालीम, सियासी तंजीम-साज़ी और अवामी बेदारी के ज़रिए क़ौमी तहरीक को मज़बूत किया।

मुसलमानों की क़ुर्बानियों को याद करना दूसरे मज़ाहिब या बिरादरियों की क़ुर्बानियों को कमतर करना नहीं है। बल्कि यह हिंदुस्तान की आज़ादी की जंग की मुकम्मल, मुख़्तलिफ़ और मुश्तरका तारीख़ को नई नस्लों तक पहुँचाने की एक कोशिश है।

टीपू सुल्तान: अंग्रेज़ी तौसीअ के ख़िलाफ़ मज़बूत मज़ाहमत

दक्षिणी हिंदुस्तान की तारीख़ में सुल्तान फ़तह अली ख़ान टीपू, जिन्हें टीपू सुल्तान के नाम से जाना जाता है, ईस्ट इंडिया कंपनी की तौसीअ पसंद पॉलिसी के ख़िलाफ़ मुसल्लह मज़ाहमत करने वाले अहम हिंदुस्तानी हुक्मरानों में शुमार होते हैं।

18वीं सदी के आख़िरी दौर में रियासत-ए-मैसूर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती हुई ताक़त के रास्ते में एक अहम रुकावट थी। टीपू सुल्तान ने फ़ौजी, इंतिज़ामी और सफ़ारती इक़दामात के ज़रिए कंपनी के बढ़ते असर का मुक़ाबला किया।

ब्रिटिश लाइब्रेरी के India Office Records में मौजूद Mss Eur F198/1/12 एक अहम ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। यह रिकॉर्ड 23 अगस्त 1798 से 28 फ़रवरी 1799 तक के दौर से ताल्लुक रखता है और इसमें टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ जंग से मुताल्लिक़ ख़त-ओ-किताबत महफ़ूज़ है। इसमें मालाबार से फ़ौजी ज़रूरतों की तकमील, पालघाट के इलाक़े से बैलों और अनाज की ख़रीद, टीपू सुल्तान के फ़्रांसीसियों से राब्ते को रोकने की कोशिशों और जंग की तैयारियों समेत कई मामलों का ज़िक्र मिलता है।

इसी सिलसिले की Mss Eur F198/1/13 में 4 अप्रैल से 21 अप्रैल 1799 तक टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ जंग, कोयंबटूर के हालात और स्थानीय सियासी व फ़ौजी सूरतेहाल से मुताल्लिक़ रिकॉर्ड मौजूद है।

Mss Eur F198/1/14 में 23 अप्रैल से 8 मई 1799 के दौरान टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ जंग और श्रीरंगपट्टनम पर हमले से मुताल्लिक़ रिकॉर्ड मिलता है, जबकि Mss Eur F198/1/15 में श्रीरंगपट्टनम के पतन, टीपू सुल्तान की मौत और उसके बाद के इंतिज़ामात से संबंधित सूचनाएँ दर्ज हैं।

1799 में श्रीरंगपट्टनम की जंग में टीपू सुल्तान की मौत दक्षिण भारत की तारीख़ का एक अहम मोड़ साबित हुई। ऐतिहासिक तौर पर टीपू सुल्तान को 1857 के बाद की क़ौमी आज़ादी की तहरीक का रहनुमा बताने के बजाय 18वीं सदी में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की नव-आबादियाती तौसीअ के ख़िलाफ़ मुसल्लह मज़ाहमत करने वाले अहम हिंदुस्तानी हुक्मरान के तौर पर बयान करना ज़्यादा सही है।

1857 की बग़ावत और बहादुर शाह ज़फ़र

1857 की बग़ावत अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ हिंदुस्तान की बड़ी मुसल्लह मज़ाहमतों में से एक थी। मेरठ से शुरू होने वाली यह बग़ावत दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई इलाक़ों तक फैल गई।

बाग़ी सिपाहियों ने मुग़ल बादशाह बहादुर शाह सानी, जिन्हें बहादुर शाह ज़फ़र के नाम से जाना जाता है, को अपना अलामती रहनुमा तस्लीम किया।

बग़ावत को कुचलने के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत ने बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ़्तार किया, उन पर मुक़दमा चलाया और उन्हें रंगून जिलावतन कर दिया। उनकी जिलावतन ज़िंदगी मुग़ल सल्तनत के सियासी ख़ातमे की एक अहम निशानी बनी।

1857 की जद्दोजहद में मुसलमानों के साथ हिंदू सिपाहियों, स्थानीय हुक्मरानों, ज़मींदारों और आम लोगों ने भी हिस्सा लिया। इसलिए 1857 को मुख़्तलिफ़ बिरादरियों की मुश्तरका अंग्रेज़-विरोधी मज़ाहमत के अहम बाब के तौर पर देखना ज़्यादा मुनासिब है।

बेगम हज़रत महल: अज़्म और हौसले की मिसाल

1857 की जद्दोजहद में ख़वातीन का किरदार भी क़ाबिल-ए-ज़िक्र रहा। बेगम हज़रत महल अवध में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ मज़ाहमत की एक अहम ख़ातून रहनुमा थीं।

उन्होंने अपने कमसिन बेटे बिरजिस क़द्र की तरफ़ से अवध की हुकूमत की ज़िम्मेदारी संभाली और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ सियासी और मुसल्लह मज़ाहमत की क़ियादत की।

1858 में अंग्रेज़ी फ़ौज के लखनऊ पर दोबारा क़ब्ज़े के बाद वह नेपाल चली गईं। बेगम हज़रत महल की जद्दोजहद इस बात की अहम मिसाल है कि हिंदुस्तान की अंग्रेज़-विरोधी तहरीक में ख़वातीन ने भी सियासी और अमली क़ियादत का किरदार अदा किया।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद: क़ौमी इत्तेहाद के अलमबरदार

20वीं सदी के आग़ाज़ में मौलाना अबुल कलाम मोहिउद्दीन अहमद आज़ाद हिंदुस्तानी क़ौमी तहरीक के अहम रहनुमाओं में शामिल हुए। उन्होंने सहाफ़त को सियासी बेदारी का ज़रिया बनाया।

मौलाना आज़ाद ने अल-हिलाल के ज़रिए अंग्रेज़ी हुकूमत की पॉलिसियों पर तनक़ीद की और अवाम में सियासी और क़ौमी शऊर पैदा करने की कोशिश की। अंग्रेज़ी हुकूमत ने अल-हिलाल पर पाबंदी लगा दी। इसके बाद मौलाना आज़ाद ने अल-बलाग़ जारी किया। इस पर भी हुकूमत ने कार्रवाई की और मौलाना आज़ाद को रांची में नज़रबंद किया गया।

वह इंडियन नेशनल कांग्रेस के अहम रहनुमा रहे और हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद तथा मुत्तहिद हिंदुस्तान के मज़बूत हामियों में शामिल थे। वह 1923 और 1940 में कांग्रेस के सदर चुने गए।

आज़ादी के बाद वह आज़ाद हिंदुस्तान के पहले वज़ीर-ए-तालीम बने और मुल्क के तालीमी निज़ाम की बुनियाद मज़बूत करने में अहम किरदार अदा किया।

तहरीक-ए-ख़िलाफ़त और तहरीक-ए-अदम-ए-तआवुन

1920 की दहाई के आग़ाज़ में तहरीक-ए-ख़िलाफ़त और महात्मा गांधी की क़ियादत में चलने वाली तहरीक-ए-अदम-ए-तआवुन हिंदुस्तानी सियासत में अहम मोड़ साबित हुईं।

तहरीक-ए-ख़िलाफ़त का अपना मज़हबी और सियासी पस-ए-मंज़र था, लेकिन उस दौर में यह तहरीक अंग्रेज़-विरोधी सियासत और तहरीक-ए-अदम-ए-तआवुन के साथ जुड़ गई।

मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, हकीम अजमल ख़ान, डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद समेत कई मुस्लिम रहनुमाओं ने इस दौर की सियासी सरगर्मियों में अहम किरदार अदा किया।

ग़ैर-मुल्की अशिया का बायकॉट, अवामी जलसे, एहतेजाज और अंग्रेज़ी इदारों से अदम-ए-तआवुन जैसी सरगर्मियों में मुख़्तलिफ़ बिरादरियों के लोगों ने हिस्सा लिया। इस दौर में हिंदू-मुस्लिम तआवुन क़ौमी तहरीक की एक अहम ख़ूबी बनकर सामने आया।

मौलाना मोहम्मद अली जौहर और डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी

मौलाना मोहम्मद अली जौहर सहाफ़ी, सियासी रहनुमा और तहरीक-ए-ख़िलाफ़त के अहम क़ाइदों में शामिल थे। वह क़ौमी तालीम के फ़रोग़ और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के क़ियाम की कोशिशों से भी जुड़े रहे।

डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी भी क़ौमी तहरीक के अहम मुस्लिम रहनुमाओं में शामिल थे। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के क़ियाम में अहम किरदार अदा किया और कांग्रेस की सरगर्मियों में भी फ़आल रहे। वह 1927 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के सदर चुने गए।

इन रहनुमाओं की ख़िदमात से साफ़ होता है कि आज़ादी की जंग सिर्फ़ सियासी जलसों या मुसल्लह मज़ाहमत तक महदूद नहीं थी, बल्कि तालीम, सहाफ़त, सियासी तंजीम-साज़ी और क़ौमी बेदारी भी इस जद्दोजहद के अहम मैदान थे।

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान: क़ुर्बानी की रोशन मिसाल

हिंदुस्तानी इंक़लाबी तहरीक की तारीख़ में अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के अहम इंक़लाबी कारकुन थे और राम प्रसाद बिस्मिल के क़रीबी साथी थे।

1925 के काकोरी रेल केस के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत ने कई इंक़लाबियों को गिरफ़्तार किया। मुक़दमे के बाद अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान को सज़ा-ए-मौत सुनाई गई और 19 दिसंबर 1927 को फ़ैज़ाबाद जेल में उन्हें फाँसी दी गई।

राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान की दोस्ती हिंदुस्तानी क़ौमी तहरीक में हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद की एक क़ाबिल-ए-ज़िक्र मिसाल है। दोनों ने मज़हबी पहचान से ऊपर उठकर मुल्क की आज़ादी को अहमियत दी।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान: ग़ैर-मुसल्लह जद्दोजहद के अलमबरदार

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ ग़ैर-मुसल्लह जद्दोजहद के अहम रहनुमाओं में शामिल थे। उन्हें “सरहदी गांधी” के नाम से भी जाना जाता है।

उन्होंने उस वक़्त के North-West Frontier Province में ख़ुदाई ख़िदमतगार तहरीक को संगठित किया। इस तहरीक के ज़रिए तालीम, समाजी इस्लाह, अमन और सियासी बेदारी पर ज़ोर दिया गया।

अंग्रेज़ी हुकूमत के सख़्त इक़दामात के बावजूद ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने ग़ैर-मुसल्लह मज़ाहमत का रास्ता नहीं छोड़ा। उनकी जद्दोजहद हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक में पुरअमन मज़ाहमत की ताक़त की एक नुमायाँ मिसाल है।

1942 की तहरीक और मौलाना आज़ाद

1942 की भारत छोड़ो तहरीक हिंदुस्तानी आज़ादी की जद्दोजहद का एक अहम मरहला थी। उस वक़्त मौलाना अबुल कलाम आज़ाद इंडियन नेशनल कांग्रेस के सदर थे और अंग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हें दूसरे अहम रहनुमाओं के साथ गिरफ़्तार कर लिया।

इस दौर में कई मुस्लिम क़ौमी कारकुनों ने कांग्रेस और दूसरी आज़ादी पसंद तंजीमों के ज़रिए अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ सरगर्मियों में हिस्सा लिया।

इस तरह मुसलमानों की क़ौमी जद्दोजहद में शिरकत सिर्फ़ 1857 या तहरीक-ए-ख़िलाफ़त तक महदूद नहीं रही, बल्कि आज़ादी के आख़िरी मरहले तक जारी रही।

आज़ाद हिंद फ़ौज में शाहनवाज़ ख़ान

दूसरी आलमी जंग के दौरान आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) में हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों और मज़ाहिब से ताल्लुक रखने वाले लोग शामिल हुए। इनमें कर्नल शाहनवाज़ ख़ान एक अहम फ़ौजी अफ़सर थे।

जंग के बाद लाल क़िले में होने वाले मशहूर INA मुक़दमे में शाहनवाज़ ख़ान के साथ कर्नल प्रेम कुमार सहगल और कर्नल गुरबख़्श सिंह ढिल्लों भी अहम मुल्ज़िमों में शामिल थे।

अगरचे आज़ाद हिंद फ़ौज अंग्रेज़ी हुकूमत को फ़ौजी ताक़त के ज़रिए ख़त्म करने में कामयाब नहीं हुई, लेकिन उसकी सरगर्मियों और INA मुक़दमात ने हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ अवामी और सियासी जज़्बात को प्रभावित किया।

कर्नाटक की सरज़मीन पर भी मज़ाहमत के नक़ूश

कर्नाटक की तारीख़ में भी अंग्रेज़ी तौसीअ के ख़िलाफ़ मज़ाहमत की अहम मिसालें मिलती हैं। ख़ास तौर पर रियासत-ए-मैसूर और श्रीरंगपट्टनम 18वीं सदी के आख़िरी दौर में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ शदीद सियासी और फ़ौजी तनाज़ुआत का मरकज़ रहे।

ब्रिटिश लाइब्रेरी के Mss Eur F198 रिकॉर्ड में 1798-99 के दौरान टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ जंग, फ़ौजी तैयारियों, रसद, फ़ौजी नक़्ल-ओ-हरकत, कोयंबटूर के हालात और श्रीरंगपट्टनम पर हमले से मुताल्लिक़ कई सरकारी ख़त-ओ-किताबत महफ़ूज़ हैं।

ये रिकॉर्ड उस दौर के सियासी और फ़ौजी हालात को समझने के लिए अहम तारीखी माख़ज़ हैं।

तारीख़ को जामेअ अंदाज़ में याद रखना ज़रूरी है

हिंदुस्तान की आज़ादी किसी एक शख़्स, एक जमाअत, एक मज़हब या एक बिरादरी की क़ुर्बानी का नतीजा नहीं थी। यह कई नस्लों की जद्दोजहद, क़ुर्बानी, ईसार और वतन-दोस्ती का हासिल थी।

टीपू सुल्तान की 18वीं सदी की अंग्रेज़-विरोधी मज़ाहमत से लेकर 1857 के बहादुर शाह ज़फ़र और बेगम हज़रत महल, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी, ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और आज़ाद हिंद फ़ौज के शाहनवाज़ ख़ान तक, मुख़्तलिफ़ दौर में कई मुसलमानों ने अंग्रेज़-विरोधी मज़ाहमत और क़ौमी तहरीक में अहम किरदार अदा किया।

तारीख़ का मुताला सियासी या मज़हबी तअस्सुब से बालातर होकर असल दस्तावेज़ात, सरकारी रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेज़ात, मुआसिर अख़बारात और मोतबर तारीखी तहक़ीक़ की बुनियाद पर किया जाना चाहिए।

मुसलमानों की क़ुर्बानियों को याद करना दूसरे तबक़ों की क़ुर्बानियों से इनकार नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की मुश्तरका आज़ादी की तारीख़ को मुकम्मल तौर पर समझने की कोशिश है।

आज़ादी किसी एक फ़र्द या एक तबक़े की अता नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के अवाम की इज्तिमाई जद्दोजहद का समर है। मुल्क के लिए जान, माल, ख़ानदान और ज़ाती आराम क़ुर्बान करने वाले हर फ़र्द की ख़िदमात को याद रखना और आने वाली नस्लों तक पहुँचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

मुसलमानों की क़ुर्बानियों को याद करना सिर्फ़ एक बिरादरी की तारीख़ को याद करना नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की कसरतुल-वजूद, मुश्तरका और जामेअ आज़ादी की तारीख़ को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करना है।

Source: Haqeeqat Times