नीतीश कुमार की दसवीं वापसी: बिहार की राजनीति का अडिग चेहरा

 

बिहार की राजनीति में लगातार बदलते समीकरणों के बीच एक नाम ऐसा है, जो पिछले पच्चीस वर्षों से स्थिर बना हुआ है—नीतीश कुमार। गठबंधन बनते और टूटते रहे, नेता बदलते रहे, वफादारियाँ भी परिवर्तित होती रहीं, लेकिन नीतीश कुमार की मौजूदगी राजनीति के हर उतार-चढ़ाव में कायम रही।

अब अगर वह एक बार फिर शपथ लेते हैं, तो यह उनकी दसवीं बार मुख्यमंत्री पद पर वापसी होगी—जो भारतीय राजनीतिक इतिहास में बेहद दुर्लभ उपलब्धि है। उनका पहला कार्यकाल वर्ष 2000 में केवल सात दिनों तक चला था, लेकिन उसके बाद बीते दो दशकों में वे बिहार की राजनीति का सबसे टिकाऊ चेहरा बने रहे।

इंजीनियरिंग से सत्ता के शिखर तक

1951 में बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार ने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से स्नातक किया। तकनीकी पृष्ठभूमि होने के बावजूद उन्होंने राजनीति को अपना करियर बनाया और 1980 के दशक के अंत में पहली बार संसद पहुँचे। 1990 के दशक में केंद्र सरकार में उन्होंने रेलवे, कृषि और सड़क एवं परिवहन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला।

उन्हें करीब से जानने वालों का कहना है कि वे सोच-समझकर निर्णय लेने वाले, संतुलित और कम भावनात्मक नेता हैं—और यही गुण उन्हें बिहार की जटिल जातीय और क्षेत्रीय राजनीति में लंबे समय तक टिकाए हुए हैं।

निजी जीवन में सादगी और एकांत

1973 में मनजू कुमारी सिन्हा से विवाह के बाद उनकी निजी जिंदगी बेहद शांत रही। पत्नी के निधन के बाद वे और अधिक एकांतप्रिय होते चले गए। उनका इकलौता बेटा, निशांत कुमार, हमेशा सार्वजनिक जीवन से दूर रहा है। हाल के वर्षों में यह चर्चा अवश्य रही है कि वह भविष्य में हरनौत से चुनाव लड़ सकते हैं—यानी अपने पिता की पुरानी सीट से।

लंबे कार्यकाल और स्वास्थ्य को लेकर उठते सवाल

लगातार सत्ता में बने रहने के बीच उनके स्वास्थ्य पर भी सवाल उठे। प्रशांत किशोर ने कहा था कि वह “शारीरिक रूप से थक चुके हैं”, जबकि तेजस्वी यादव ने उन्हें “थका हुआ मुख्यमंत्री” बताया। वहीं भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने कहा, “मुख्यमंत्री कुछ कमजोर दिखते हैं, लेकिन स्वास्थ्य को राजनीति का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।”

इन आलोचनाओं के बावजूद, हर राजनीतिक चुनौती के बाद उनकी वापसी और भी मजबूत दिखाई देती है।

अवसरवाद या व्यावहारिक नेतृत्व?

बीजेपी हो या आरजेडी—हर गठबंधन में नीतीश कुमार ने विकास, सड़क नेटवर्क और प्रशासनिक सुधार को अपनी पहचान बनाया। समर्थक उन्हें परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने वाला व्यावहारिक नेता कहते हैं, जबकि आलोचक उन्हें अवसरवादी बताते हैं।

सच शायद दोनों के बीच कहीं है—उनकी वास्तविक शक्ति उनकी राजनीतिक लचीलापन और हर संकट में रास्ता खोज लेने की क्षमता में निहित है।

2025 चुनाव और नेतृत्व की स्थिरता

2025 के चुनावी नतीजों के बाद “बिहार का मतलब नीतीश कुमार” जैसा नारा भले कुछ थकाऊ लगे, लेकिन इसके पीछे दो दशक की स्थिरता, अनुभव और राजनीतिक पकड़ स्पष्ट रूप से दिखती है।

मुख्यमंत्री का पद दस बार संभालना किसी के लिए असाधारण हो सकता है, लेकिन बिहार जैसे अस्थिर राजनीतिक माहौल में यह नीतीश कुमार की लगातार बनी हुई स्थिरता और दृढ़ता का प्रमाण भी है।

लेखक के विचारों से संस्थान का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

लेखक: जमी़ल अहमद मलिनसार
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Source: Haqeeqat Time