आरएसएस के 100 साल, मुसलमानों के 700 साल

हिंदुस्तान में मुसलमानों ने सात सौ साल से ज्यादा समय तक शासन किया। उन्होंने इमारतों और ज्ञान के क्षेत्र में बहुत कुछ दिया। लेकिन अफसोस, आजादी के सत्तर साल बाद भी हिंदुस्तानी मुसलमान अपनी पहचान को मजबूत करने में पीछे रह गए हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), जो 1925 में शुरू हुआ, ने सौ साल से भी कम समय में हर क्षेत्र में अपनी मजबूत जगह बना ली। आरएसएस ने शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया। स्कूल, कॉलेज, प्रशिक्षण शिविर और अपने विचारों के अनुसार नई पीढ़ी को तैयार किया। वे पंडित या मठ नहीं बनाते, बल्कि ऐसी पीढ़ी तैयार करते हैं जो राजनीति, अर्थव्यवस्था, पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों में आगे हो।

आरएसएस की सफलता का राज उनकी संगठन शक्ति और शिक्षा पर ध्यान है। उन्होंने अपने लोगों को अनुशासन सिखाया और उन्हें एक मकसद दिया। इसके मुकाबले, मुसलमानों के पास शिक्षण संस्थान कम हैं, संसाधन सीमित हैं, और सोच बंटी हुई है। हम मदरसों और आधुनिक शिक्षा के बीच संतुलन नहीं बना सके। हमारी नई पीढ़ी ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व से दूर है।

सवाल यह है कि जो कौम सात सौ साल तक हुकूमत में रही, वह आज अपनी पहचान क्यों खो रही है? इसका कारण साफ है—मुसलमानों ने शिक्षा को नजरअंदाज किया, नेतृत्व को मजबूत नहीं किया, और सामूहिक योजनाओं से दूर रहे। अपनी तारीख पर गर्व तो करते हैं, लेकिन उसे आगे बढ़ाने में नाकाम रहे।

मुसलमानों की शैक्षिक अक्षमता पर खुलकर बात करें तो यह एक गंभीर लापरवाही है, जो पूरी कौम को पीछे धकेल रही है। आज भी कई मुस्लिम युवा आधुनिक ज्ञान से दूर हैं। वे विज्ञान, तकनीक और प्रबंधन की बजाय पारंपरिक रास्तों पर चलते हैं, जो उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर रखते हैं। यह अक्षमता नहीं, बल्कि एक तरह की आत्मघाती सोच है, क्योंकि बिना ज्ञान के कोई कौम जिंदा नहीं रह सकती।

मुसलमानों ने अपने बच्चों के लिए अच्छे शिक्षण संस्थान नहीं बनाए। अगर बनाए भी, तो वे केजी से एमए तक के स्तर के नहीं हैं। नतीजा यह है कि वे सरकारी नौकरियों, व्यापार और नेतृत्व के क्षेत्र में पीछे रह गए। यह लापरवाही पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो मुसलमान सिर्फ वोटर बनकर रह जाएंगे, न कि फैसला लेने वाले।

मुसलमानों को अपनी आंखें खोलनी होंगी और शिक्षा को अपनी जिंदगी का केंद्र बनाना होगा। कौम के अमीर लोगों को चाहिए कि वे शैक्षिक फंड बनाएं, गरीब बच्चों की मदद करें, वरना उनका पैसा भी बेकार है। नेताओं को चाहिए कि वे राजनीति के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों की स्थापना पर भी ध्यान दें, वरना वे सिर्फ भाषण देते रहेंगे और कोई बदलाव नहीं आएगा।

कड़े शब्दों में कहें तो अब मुसलमानों को “मैं, मेरा, मेरे” की सोच छोड़कर समाज, कौम और इंसानियत के लिए काम करना होगा। वरना, आरएसएस जैसी संगठन उन्हें और पीछे धकेल देंगे। शिक्षा हासिल करें, शिक्षण संस्थान बनाएं, रोजगार के केंद्र स्थापित करें और अपना मुकाम बनाएं। नहीं तो इतिहास मुसलमानों को नाकाम कौम के रूप में याद रखेगा।

अब वक्त है कि मुसलमान अपनी सोच बदलें। शिक्षा को सिर्फ नौकरी का जरिया न समझें, बल्कि इसे अपनी इज्जत और ताकत का रास्ता बनाएं। अपने स्कूलों और कॉलेजों को आधुनिक बनाना होगा। नई पीढ़ी को विज्ञान, भाषा, तकनीक और नैतिकता की शिक्षा देनी होगी।

आरएसएस से सीखना चाहिए कि कैसे उन्होंने शिक्षा को हथियार बनाया, क्योंकि वे जानते हैं कि ज्ञान ही असली ताकत है। अगर मुसलमानों ने शिक्षा को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया, तो उनकी सात सौ साल की तारीख सिर्फ किताबों में रह जाएगी, और सौ साल की एक संगठन उन पर फिक्री तौर पर हावी रहेगी। मुसलमानों को अपनी नई पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि वे इस देश में अपना मुकाम बनाएं और भविष्य को संवारें।

आज हिंदुस्तान में आरएसएस की ताकत किसी से छिपी नहीं है। हैरानी की बात यह नहीं कि वे मजबूत हैं, बल्कि यह है कि वे बिना शोर-शराबे, बिना जलसों-जुलूसों के, खामोशी से मजबूत हो रहे हैं। उनके पास स्कूल, हॉस्टल, लाइब्रेरी, रोजगार के केंद्र और प्रशिक्षण शिविर हैं। वे युवाओं को शारीरिक और बौद्धिक रूप से तैयार करते हैं, उन्हें अनुशासन सिखाते हैं और सबसे बढ़कर एक “मकसद” देते हैं—वह मकसद जो उन्हें खामोशी से एकजुट रखता है।

दूसरी ओर, मुस्लिम कौम आज भी सिर्फ जलसों, जुलूसों और नारेबाजी में मशगूल है। भाषण भावनात्मक हैं, मगर व्यावहारिक कदमों का अभाव है। हम इस गलतफहमी में हैं कि नारों से क्रांति आ जाएगी, जबकि हकीकत यह है कि कौमों की तकदीर काम से बदलती है, कथनों से नहीं।

मुसलमानों ने अपनी युवा पीढ़ी को मकसद से दूर कर दिया है। उनके शिक्षण संस्थान सिर्फ परीक्षा पास करने के केंद्र बन गए हैं, न कि प्रशिक्षण और जागरूकता के। संगठन अस्थायी जोश में इकट्ठा होते हैं और अस्थायी ठंडक के साथ बिखर जाते हैं। आरएसएस के लोग रोज एक घंटा शाखा में बिताते हैं, जबकि हम घंटों भाषण सुनकर भी एक काम नहीं करते। वे “काम” से विचारधारा बनाते हैं, हम “शब्दों” से नारे।

अगर मुसलमान वाकई अपनी बक़ा और इज्जत चाहते हैं, तो हमें शोर से ज्यादा जागरूकता, जलसों से ज्यादा संस्थानों, और नारों से ज्यादा अनुशासन की जरूरत है। हमें “शिक्षा, संगठन और काम” पर वही मेहनत करनी होगी, जो आरएसएस अपने विचारों के लिए करता है, लेकिन अपने ईमान के जज्बे के साथ। क्योंकि कौमें नारे नहीं, निजाम से बनती हैं।

लेखक: मुदस्सिर अहमद, शिमोगा
संपर्क: 9986437327

Source: haqeeqat Time

(लेखक दैनिक “आज का इंकलाब”, शिमोगा के संपादक हैं। लेखक के विचारों से प्रकाशन का सहमत होना जरूरी नहीं है।)