तमिलनाडु के मदुरै में तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर सिकंदर बादुशा दरगाह के पास ‘कार्तिगै दीपम’ जलाने को लेकर हुए विवाद के जवाब में वाम दलों ने संयुक्त बयान जारी कर चेतावनी दी है कि सांप्रदायिक तनावों को जानबूझकर भड़काया जा रहा है. यह पहाड़ी, जहां तीन मंदिर, एक दरगाह और प्राचीन जैन गुफाएं हैं, लंबे समय से एक साझा स्थल रही है, जहां अलग-अलग समुदाय साथ पूजा करते आए हैं.

 

नई दिल्ली: तमिलनाडु के मदुरै में तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर सिकंदर बादुशा दरगाह के पास ‘कार्तिगै दीपम’ जलाने को लेकर हुए विवाद के जवाब में वाम दलों ने एक संयुक्त बयान जारी कर चेतावनी दी है कि सांप्रदायिक तनावों को जानबूझकर भड़काया जा रहा है.

ज्ञात हो कि यह पहाड़ी, जहां तीन मंदिर, एक दरगाह और प्राचीन जैन गुफाएं हैं, लंबे समय से एक साझा स्थल रही है, जहां अलग-अलग समुदाय साथ-साथ पूजा करते आए हैं.

वाम दलों का कहना है कि सह-अस्तित्व का यह लंबा इतिहास अब खतरे में है. अपने संयुक्त बयान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उससे जुड़े हिंदुत्व संगठनों पर राजनीतिक लाभ के लिए अशांति फैलाने का आरोप लगाया है.

उनका कहना है कि जो स्थान सह-अस्तित्व का प्रतीक रहा है, उसे तमिलनाडु में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने की सोची-समझी कोशिश में घसीटा गया है.

बयान के अनुसार, विवाद तब शुरू हुआ जब भाजपा नेताओं ने पहाड़ी पर पहुंचकर उसे ‘दक्षिण की अयोध्या’ बताया और ज़िले के बाहर से समर्थकों को बुलाया.

बयान में कहा गया है, ‘तमिलनाडु में राजनीतिक लाभ लेने की मंशा से भाजपा नेताओं ने इस वर्ष फरवरी में इस स्थल को ‘दक्षिण की अयोध्या’ बताया, बाहर से लोगों को लाया और घटना को भड़काने की कोशिश की. साथ ही, उन्होंने माहौल खराब करने और मतभेद पैदा करने के लिए सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल किया.’

दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों ने तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के पास विरोध प्रदर्शन किया. (फोटो: प्रशांत शनमुगसुंदरम)

विवाद दिसंबर 2025 में और गहरा हो गया, जब मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने इस स्थल से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई की.

संयुक्त बयान में निराशा जताई गई है कि अदालत ने पूर्व न्यायिक निर्णयों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और 1991 के ‘उपासना स्थल अधिनियम’ द्वारा दी गई सुरक्षा को नजरअंदाज किया. बयान में कहा गया, ‘ये टिप्पणियां न केवल पूर्व फैसलों की अनदेखी करती हैं बल्कि कानून-व्यवस्था के मामलों में राज्य सरकार के अधिकार को दरकिनार कर संविधान की संघीय भावना को भी कमजोर करती हैं.’

नेताओं का कहना है कि अदालत द्वारा बादुशा दरगाह के पास स्थित ब्रिटिश काल के सर्वे स्तंभ पर याचिकाकर्ता को ‘कार्तिगै दीपम’ (शिव और मुरुगन के सम्मान में घरों और मंदिरों में दीये जलाने की एक तमिल परंपरा) जलाने की अनुमति देना, उन समूहों को अवसर देना है जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण चाहते हैं.

बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में सीपीआई(एम) के महासचिव एमए बेबी, सीपीआई के महासचिव डी. राजा, सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, आरएसपी के महासचिव मनोज भट्टाचार्य और एआईएफबी के महासचिव जी. देवराजन शामिल हैं.

राज्य सरकार और मंदिर प्रशासन ने इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन एकल न्यायाधीश ने इस कार्य की अनुमति दी और याचिकाकर्ता को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) से सुरक्षा मांगने का विकल्प भी दिया.

वाम दलों का कहना है कि इससे कानून-व्यवस्था पर राज्य के संवैधानिक अधिकार को कमजोर किया गया और संघीय संतुलन को चोट पहुंची.

जैसे-जैसे तनाव बढ़ा हिंदू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया और झड़पें हुईं. प्रशासन ने धारा 144 के तहत प्रतिबंध लगाए (जो अब दंड प्रक्रिया संहिता के स्थान पर लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, बीएनएसएस की धारा 163 के समान है), और यह मुद्दा तेजी से राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया.

बयान में मदुरै और तमिलनाडु के लोगों की सराहना की गई है कि उन्होंने सांप्रदायिक मुहिम का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. इसके साथ ही द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) सरकार द्वारा स्थिति से अच्छे तरीके से निपटने के लिए प्रशंसा की.

वाम दलों ने राज्य की विपक्षी पार्टी ऑल इंडिया अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) की भी आलोचना की है कि वह कथित तौर पर विभाजनकारी ताकतों के साथ खड़ी है.

संयुक्त बयान के अंत में मदुरै के सांसद सुवेंकटेशन को निशाना बनाए जाने और उन्हें हिंदुत्व समूहों द्वारा दी गई कथित जान से मारने की धमकियों की कड़े शब्दों में निंदा की गई है.

वाम दलों ने लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष सोच वाले नागरिकों से अपील की है कि वे संघ परिवार की सांप्रदायिक राजनीति को खारिज करें. उनके अनुसार, जिसका इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ‘रोजी-रोटी और संवैधानिक अधिकारों पर जारी हमले’ से ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है.

 

Source: The Wire