वंदे मातरम और इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र: तौहीद के ख़िलाफ़ या वतन की सदा?

माननीय जमील अहमद मिलनसार के लेख “वतन का नग़मा मुहब्बत — वंदे मातरम् का नया परिदृश्य” में देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ को अनजाने में स्वीकृति दिलाने का प्रयास किया गया है। जबकि, हिंदुस्तान के मुसलमानों ने किसी भी दौर में इस्लामी दृष्टिकोण और इस्लाम के अक़ीदा-ए-तौहीद (एकेश्वरवाद) की बुनियाद पर इस नग़मे को न तो स्वीकार किया है और न ही कर सकते हैं। यह स्पष्ट रहे कि इस्लाम में अक़ीदा-ए-तौहीद और देशभक्ति के बीच अंतर और सीमाएं स्पष्ट हैं।

इस्लामी दृष्टिकोण से ‘वंदे मातरम्’ के संबंध में बहस को कुछ बुनियादी बिन्दुओं में विभाजित किया जा सकता है:

1. देशभक्ति बनाम अक़ीदा-ए-तौहीद (एकेश्वरवाद)

2. मुहब्बत का नग़मा या इबादत का नग़मा?

लेखक ने इस नग़मे को अपने लेख और उसके शीर्षक में “नग़मा-ए-मुहब्बत,” “इत्तिहाद (एकता) की अलामत,” और “एक ग़ुलाम क़ौम के दिल से उठने वाली आज़ादी की सदा” क़रार दिया है। लेखक ने यह भी लिखा है कि “वंदे मातरम् क़ौम की रूह (आत्मा) की धड़कन है” और इसने “उत्तर से दक्षिण तक एक वजदानी वाबस्तगी (भावनात्मक जुड़ाव) पैदा की।”

इस बात को समझने की ज़रूरत है कि “वंदे मातरम्” में वतन से मुहब्बत का इज़हार नहीं किया गया है, बल्कि शुरू से आख़िर तक इसमें वतन को एक देवी और माँ की शक्ल देकर उसकी इबादत (पूजा) के जज़्बात का इज़हार किया गया है। “देशभक्ति (हुब्बुल-वतनी)” और “वतन या क़ौम-परस्ती (राष्ट्रवाद)” ये दो अलग-अलग चीज़ें हैं। ‘हुब्ब‘ या “मुहब्बत” एक फ़ितरी जज़्बा है जिसे अल्लाह तआला ने हर इंसान के दिल में पैदा कर रखा है और इस जज़्बे का इज़हार विभिन्न तरीक़ों से होता है और विभिन्न वस्तुओं के लिए भी होता है, जिनमें से वतन भी एक है। और दूसरे आम इंसानों की तरह एक मुसलमान भी अपने वतन से उतनी ही मुहब्बत करता है, बल्कि इस्लामी तालीमात और ख़ुद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अमल की पैरवी में मुसलमान अपने वतन से बेतहाशा मुहब्बत करता है।

इस्लाम में वतन से मुहब्बत (देशभक्ति) एक फ़ितरी जज़्बा है और इसे मुस्तहसन (सराहनीय) समझा जाता है। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का से हिजरत करते वक़्त मक्का मुकर्रमा को ख़िताब करके फ़रमाया था कि “तू मुझे सबसे ज़्यादा महबूब है।” लेकिन इस्लाम में “मुहब्बत” और “इबादत” के दरमियान एक वाज़ेह सुर्ख़ लकीर पाई जाती है, जिसे “एक बारीक और नाज़ुक ख़त-ए-इम्तियाज़ (अंतर की सूक्ष्म रेखा)” कहना बिल्कुल दुरुस्त नहीं होगा।

लफ़्ज़ “परस्ती” ‘परस्तिश’ से माख़ूज़ है जिसके मायने “इबादत” के हैं। मुसलमान वतन से मुहब्बत करता है और इसी तरह क़ौम से भी उसको वतनी और इंसानी बुनियादों पर मुहब्बत होती है, लेकिन वह न ही मुल्क और वतन की परस्तिश (पूजा) करता है और न ही क़ौम-परस्ती (राष्ट्रवाद) करता है।

अब आइए लफ़्ज़ “वंदे मातरम्” को समझें। ‘वंदे‘ संस्कृत में इबादत, पूजा और अत्यंत अक़ीदत व तअज़ीम के साथ झुकने के मअनों में इस्तेमाल होता है। इस्लाम का बुनियादी अक़ीदा “तौहीद” है, यानी इबादत और बंदगी सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त के लिए है।

मुसलमान अपनी ज़मीन, अपने वतन से मुहब्बत ज़रूर करता है, उसकी हिफ़ाज़त के लिए जान भी दे सकता है, लेकिन वह ज़मीन को “माबूद (पूज्य)” या “देवी” का दर्जा देकर उसके सामने झुक नहीं सकता। लिहाज़ा, ऐतराज़ मुहब्बत पर नहीं, बल्कि इस नग़मे में मौजूद शिर्किया अल्फ़ाज़ और तसव्वुरात पर है और यह चीज़ इस नग़मा की बिल्कुल इब्तिदा (शुरुआत) ही से है और लफ़्ज़ “वंदे मातरम्” ही शिर्किया और तौहीद के ख़िलाफ़ है, जिसकी वजह से मुस्लिम क़ाइदीन ने शुरू दिन ही से इसकी मुख़ालफ़त की थी। लिहाज़ा, यह कहना भी ग़लत है कि यह नग़मा इत्तिहाद (एकता) की अलामत था या है और न ही यह “क़ौम की रूह की धड़कन” है।

इस्लाम में “मुजर्रद तसव्वुर (केवल एक कल्पना)” की पूजा या उसे देवी-देवता मानना शिर्क है। जब एक मुसलमान “वंदे मातरम्” कहता है तो वह जाने-अनजाने में वतन को एक देवी मानकर उसकी पूजा का इक़रार कर रहा होता है, जो कि अक़ीदा-ए-तौहीद के मुनाफ़ी (विरुद्ध) है।

3. आज़ादी की सदा?

मज़मून में बंकिम चंद्र चटर्जी की तख़लीक़ को “ग़ुलाम क़ौम के दिल से उठने वाली आज़ादी की सदा” कहा गया है। अगर इस बात को तस्लीम कर लिया जाए तो यह सवाल पैदा होता है कि बंकिम चंद्र चटर्जी के नज़दीक “ग़ुलाम क़ौम” कौन है और वह किस “ज़ालिम” से आज़ादी हासिल करना चाहती है?

यह नग़मा बंकिम चंद्र चटर्जी के नॉवेल “आनंद मठ” (1882 ई.) से लिया गया है। अदबी और तारीख़ी तहक़ीक़ यह बताती है कि इस नॉवेल का बुनियादी प्लाट (संन्यासी विद्रोह के पृष्ठभूमि में) मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत पर मब्नी (आधारित) था। इस नग़मे में वतन को हिंदू देवियों (दुर्गा और काली) के रूप में पेश किया गया है। “ग़ुलाम” हिंदू क़ौम और हिंदू मज़हब है और “ज़ालिम हुक्मरान” अंग्रेज़ नहीं, बल्कि मुसलमान क़ौम है।

‘वंदे मातरम्’ गीत ‘आनंद मठ’ नॉवेल में, इसके दसवें अध्याय में आता है, जहाँ इस कहानी का असल किरदार भवानंद अपने साथी मोहेन्द्रा के साथ जंगल से गुज़रते हुए इसे गाता है। इस गीत के हवाले से दोनों के दरमियान एक मुकालमा शुरू हो जाता है, जिसमें एक मोड़ पर भवानंद कहता है, “तुम देखो कि साँप ज़मीन पर रेंगता है और सबसे कमतरीन मख़लूक़ है, लेकिन उसकी गर्दन पर तुम पैर रखो तो वह भी अपना फन खोलकर खड़ा हो जाता है। तो क्या कोई चीज़ तुम्हें तुम्हारे सब्र से बाहर नहीं निकाल सकती। तुम्हें जो मुमालिक (देश) मालूम हैं उन्हें देखो, मगध, मिथिला, काशी, कांची, दिल्ली, कश्मीर, इनके अलावा कौन सा मुल्क है जहाँ लोग भूख की वजह से घास खाते हों? काँटे खाते हों? सफ़ेद मकोड़ों के ज़रिये जमा की गई मिट्टी खाते हों? जंगलों की पत्तियाँ खाते हों? और कहाँ ऐसी जगह है जहाँ लोग कुत्ते और गीदड़ खाने पर मजबूर हों, हाँ मुर्दा इंसानों के जिस्म भी खाने पर मजबूर हों। ऐसी कौन सी दूसरी जगह है जहाँ लोगों को उनके संदूक़ों में रखे हुए पैसों, उनके घरों में मुक़द्दस (पवित्र) नशिस्तों पर बैठे हुए ख़ुदाओं, उनके घरों में मौजूद औरतों और उन औरतों की कोख़ (गर्भ) में मौजूद अ-उत्पादक बच्चों के तअल्लुक़ से ख़ौफ़ की वजह से उनके दिल लर्ज़ाबरअंदाम (डरे हुए) हों। अरे! यहाँ तो हामिला औरतों की कोख़ चीर कर बच्चों को बाहर निकाल कर फाड़ दिया जाता है। हर एक मुल्क में हाकिम के साथ का रिश्ता मुहाफ़िज़ और महफ़ूज़ का होता है, मगर हमें हमारे मुसलमान हाकिम क्या तहफ़्फ़ुज़ देते हैं? हमारा मज़हब बर्बाद कर दिया जाता है, हमारी ज़ातें मजरूह (घायल) की जाती हैं, हमारी इज़्ज़तें पामाल होती हैं, हमारे ख़ानदानों की इज़्ज़तों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं और हमारी ज़िंदगियाँ इसी तरह गुज़र रही हैं। जब तक हम इन बदी और बुराई की तजसीम (अवतार), लंबी दाढ़ियों वालों को बाहर नहीं निकालेंगे हिंदुओं का, हिंदू मज़हब का ख़ात्मा यक़ीनी है।”

सिर्फ़ इस एक इक़्तिबास से यह बात वाज़ेह हो जाती है कि “वंदे मातरम्” का मक़सद मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदू अक़वाम को मुश्तइल करना और उन्हें मुसलमानों के क़त्ल-ए-आम पर उकसाना था, जिसकी वजह से इस नग़मे को सबसे पहले कांग्रेस के इजलास में तरन्नुम से गाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर ने भी इसकी मुख़ालफ़त की थी और इसके मुक़ाबला में “जन गण मन” की तख़लीक़ की थी।

4. समझौता या अक़ीदा?

लेखक ने मौलाना आज़ाद और दीगर रहनुमाओं का हवाला देते हुए कहा है कि उन्होंने पहले दो बंदों को मुंतख़ब किया जो मज़हबी रंग से दूर थे। तारीख़ गवाह है कि सन 1920 तक भी मुजाहिदीन-ए-आज़ादी के दिलों में जोश भरने वाला नअरा ‘वंदे मातरम्’ नहीं, बल्कि “इंकलाब ज़िंदाबाद” था। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सत्याग्रह हों या दीगर तहरीकात, हिंदू-मुसलमान मिलजुल कर निकलते और हिंदू जहाँ “भारत माता की जय” के नअरे लगाते, वहाँ मुसलमान “अल्लाह-हु-अकबर” की तकबीरात भी बुलंद करते थे, और इसमें कहीं कोई टकराव नहीं होता था।

सन 1920 के बाद जब अंग्रेज़ों की साज़िशों के नतीजा में हिंदू-मुस्लिम तफ़रीक़ (भेदभाव) उरूज पर पहुँची तो उसके बाद ही हिंदू इंतिहा-पसंदों (चरमपंथियों) ने “वंदे मातरम्” का नअरा बुलंद किया और यही वजह थी कि कांग्रेस ने इस मसले को हल करने के लिए पहल की और यह बात भी दुरुस्त है कि 1937 ई. में एक सियासी समझौता हुआ था ताकि हिंदू-मुस्लिम इत्तिहाद को बचाया जा सके। मौलाना आज़ाद और दीगर उलमा ने सियासी मस्लहत (राजनीतिक ज़रूरत) के तहत आख़िरी बंदों (जिनमें खुलकर बुतपरस्ती का ज़िक्र था) को हज़फ़ (हटा) करवा दिया था और इब्तिदाई दो बंदों को सरकारी तक़ारीब में गाए जाने की मंज़ूरी दी थी। इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं कि इसके बाद सिर्फ़ ‘वंदे मातरम्’ का नअरा किसी तरह हिंदुस्तानियों के क़ौमी जज़्बात को उभारने के लिए इस्तेमाल किया गया हो।

फ़ाज़िल मज़मून निगार का कहना है कि “बाद के हिस्सों में मख़्सूस अलामती तश्बीहें आईं जिन्हें बाज़ अहल-ए-ईमान ने अपने अक़ाएद (मान्यताओं) से मुतसादिम (टकराता हुआ) पाया,” वाज़ेह रहे कि ये अलामती तश्बीहें नहीं, बल्कि मुसन्निफ़ के गहरे अक़ाएद का इज़हार था और ये चीज़ें सिर्फ़ “बाज़ अहल-ए-ईमान” के ख़्याल में उनके अक़ाएद से मुतसादिम नहीं थे, बल्कि तमाम अहल-ए-ईमान के लिए यह चीज़ें नाक़ाबिल-ए-क़बूल थीं और हैं।

मज़मून निगार का मज़ीद कहना है कि “यह निज़ाअ (विवाद) दरअसल मज़हब नहीं, बल्कि तअब्बीर (व्याख्या) का मसला था,” जबकि हक़ीक़त यह है कि यह मसला मुसलमानों के लिए हमेशा ही से मज़हब और अक़ीदे का रहा है और मुसलमान किसी भी क़ीमत पर अक़ीदा-ए-तौहीद के साथ समझौता नहीं कर सकते।

‘वंदे मातरम्’ गीत के इब्तिदाई दो बंदों को सरकारी तक़ारीब के लिए मंज़ूरी के बावजूद उलमा-ए-इस्लाम और फ़ुक़हा की अक्सरियत का मानना है कि पहले दो बंदों में भी “वंदे” का लफ़्ज़ मौजूद है और इसमें वतन को “माँ (ब-तौर-ए-देवी)” पुकारा गया है। अगरचे ज़ाहिरी बुतपरस्ती के अल्फ़ाज़ हटा दिए गए, लेकिन नग़मे की “रूह” वही रही। इसीलिए बाद में भी मुसलमानों की बड़ी अक्सरियत और उलमा (ब-शामूल मुफ़क्किर-ए-इस्लाम हज़रत मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी रहमतुल्लाह अलैह) ने इसे अक़ीदे के लिए ख़तरा समझा और इससे इज्तिनाब (परहेज़) का हुक्म दिया।

5. सियासी हथियार या दिल की आवाज़?

मज़मून में प्रियंका गांधी के हवाले से कहा गया कि इसे सियासी हथियार नहीं बनाना चाहिए और यह हर हिंदुस्तानी के दिल की आवाज़ है। इस बात से इत्तिफ़ाक़ किया जा सकता है कि देशभक्ति को सियासी हथियार नहीं बनाना चाहिए। इस्लाम ज़ुल्म (जबर) की मुख़ालफ़त करता है। आईन-ए-हिंद की दफ़ा 25 भी मज़हबी आज़ादी की ज़मानत देती है। अगर कोई मुसलमान अपने मज़हबी अक़ाएद की बुनियाद पर यह नग़मा नहीं गाता, तो इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि वह मुहिब्ब-ए-वतन (देशभक्त) नहीं है।

प्रियंका गांधी या किसी भी ग़ैर-मुस्लिम के लिए यह नग़मा उनके दिल की आवाज़ हो सकती है, लेकिन किसी हिंदुस्तानी मुसलमान के लिए इस बात को तस्लीम नहीं किया जा सकता और फ़ाज़िल मज़मून निगार का “वंदे मातरम्” को आज दोबारा इत्तिहाद और हम-आहंगी की अलामत क़रार देना तारीख़ी हक़ाएक़ का इनकार और इस्लाम के बुनियादी अक़ाएद से मुग़ायर (विरुद्ध) बात है।

मुसलमानों के लिए “जय हिंद,” “हिंदुस्तान ज़िंदाबाद” या अल्लामा इक़बाल का “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” पढ़ने में कोई क़बाहत (बुराई) नहीं, क्योंकि इनमें शिर्किया मफ़हूम (बहुदेववाद का अर्थ) नहीं है। ज़बरदस्ती “वंदे मातरम्” गवारा करवाना जम्हूरियत और सेक्युलरिज़्म की रूह के ख़िलाफ़ है।

6. शराई हुज्जत (धार्मिक प्रमाण)

मज़मून का एक हिस्सा मंज़ूर रिज़वी के ख़त पर मब्नी है जो हमारी रियासत के मआरूफ़ मुअर्रिख़ (इतिहासकार) डॉ. मौलाना ज़हीर अहमद राही फ़िदई साहब की किताब में मौजूद है, जिसमें मंज़ूर रिज़वी कहते हैं कि “क़ौम की ख़िदमत और इंसाफ़ का क़ियाम ईमान के ऐन मुताबिक़ है” और क़ौमी नअरों में तअस्सुब नहीं है।

इसमें कोई शक नहीं कि इस्लाम में ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ (जन सेवा) और अद्ल व इंसाफ़ का क़ियाम ईमान का हिस्सा है। इस्लाम अपने मानने वालों को बेहतरीन शहरी बनने की तलक़ीन करता है। **तथापि, मंज़ूर रिज़वी साहब का यह कहना कि क़ौमी नअरों (ब-शामूल वंदे मातरम्) में मज़हबी तअस्सुब नहीं, यह उनकी ज़ाती राय या उस वक़्त की सियासी ज़रूरत हो सकती है, लेकिन यह शरई हुज्जत (धार्मिक प्रमाण) नहीं है। शरियत का उ्सूल यह है कि अगर किसी अमल में “शिर्क” का शाइबाह (अंश) भी हो, तो उससे बचना लाज़िम है।

मुसलमानों ने जंग-ए-आज़ादी में बेपनाह क़ुर्बानियाँ दीं, रेशमी रुमाल तहरीक, 1857 ई. की जंग-ए-आज़ादी और हज़ारों उलमा को फाँसी पर चढ़ा दिया जाना वग़ैरह से तारीख़ इनकार नहीं कर सकती, लेकिन ये क़ुर्बानियाँ “वंदे मातरम्” गाने की मर्हून-ए-मिन्नत (एहसानमंद) नहीं थीं, बल्कि जज़्बा-ए-जिहाद और देशभक्ति के तहत थीं।

7. निष्कर्ष

मज़मून का इख़्तिताम इस बात पर होता है कि वतन की मुहब्बत ईमान की तकमील है।

यह जुमला कि “देशभक्ति ईमान का हिस्सा है” (हुब्बुल-वतन मिनल-ईमान) अक्सर बोला जाता है (अगरचे यह मुस्तनद हदीस नहीं है, लेकिन इसका मफ़हूम दुरुस्त और इस्लामी तालीमात के ऐन मुताबिक़ है), लेकिन इस्लाम की रू से ईमान की तकमील अल्लाह और उसके रसूल की इताअत (आज्ञापालन) में है।

इत्तिहाद का मतलब यह नहीं है कि मुसलमान अपने बुनियादी अक़ाएद से दस्तबरदार (पीछे हट) हो जाएँ। हक़ीक़ी “कसरत में वहदत (अनेकता में एकता)” तब है जब हम एक-दूसरे के मज़हबी जज़्बात और हदूद का एहतिराम करें। एक मुसलमान अपने हिंदू भाई के अक़ीदे का एहतिराम करता है, लेकिन वह ख़ुद वह अमल नहीं कर सकता जो उसके दीन में मना और हराम है।

ख़ुलासा यह कि मुसलमान हिंदुस्तान से शदीद मुहब्बत करते हैं, यह उनका वतन और जाए-पैदाइश (जन्मस्थान) है। मुसलमानों का “वंदे मातरम्” पर ऐतराज़ सियासी नहीं, बल्कि ख़ालि-सन मज़हबी और अक़ीदे की बुनियाद पर है। हम ज़मीन को “माँ (ब-तौर-ए-देवी)” पूज नहीं सकते, क्योंकि सजदा और इंतिहाई तअज़ीम सिर्फ़ अल्लाह के लिए है। मुसलमानों के पास देशभक्ति के इज़हार के लिए हज़ारों तरीक़े हैं और “सारे जहाँ से अच्छा” जैसा ख़ूबसूरत तराना मौजूद है जो बिला तफ़रीक़-ए-मज़हब-ओ-मिल्लत सब के लिए क़ाबिल-ए-क़बूल है।

क़ौमी हम-आहंगी के लिए ज़रूरी है कि किसी ख़ास सक़ाफ़ती या मज़हबी अलामत को पूरी क़ौम पर मुसल्लत (थोपा) न किया जाए, बल्कि एक-दूसरे के अक़ाएद का पास (लिहाज़) रखा जाए। इस्लामी दृष्टिकोण से, ईमान का सौदा करके वतन की मुहब्बत का सुबूत देने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि तारीख़ गवाह है कि मुसलमानों ने अपने मुल्क, वतन और इस सरज़मीन के लिए “अल्लाह-हु-अकबर” के नअरा-ए-तकबीर के साथ फाँसी के फंदों को चूमा है।

(मज़मून निगार की राय से इदारे का मुत्तफ़िक़ होना ज़रूरी नहीं।)

सुलैमान खान, मोती नगर, बंगलौर

Source: Haqeeqat Time (translate in hindi)