लड़की–लड़का में भेदभाव नहीं: सबके लिए शिक्षा आवश्यक

समाज की सर्वांगीण प्रगति के लिए शिक्षा एक मूल स्तंभ है। यह सर्वमान्य सत्य है कि शिक्षित समाज ही विकसित समाज होता है, लेकिन दुर्भाग्यवश आज भी कई स्थानों पर लड़कियों और लड़कों के बीच भेदभावपूर्ण सोच कायम है, जो अत्यंत चिंताजनक है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करता है, परंतु जमीनी स्तर पर इन अधिकारों का समान रूप से क्रियान्वयन अब तक पूरी तरह संभव नहीं हो पाया है। विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

शिक्षा केवल अक्षर-ज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि यह व्यक्तित्व-निर्माण की एक समग्र प्रक्रिया है। शिक्षित बच्चा प्रश्न पूछने की क्षमता, तार्किक सोच और समाज के हित के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करता है। ऐसी शिक्षा लड़कियों और लड़कों—दोनों को समान रूप से मिलनी चाहिए। किंतु ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आज भी अनेक लड़कियों को स्कूल छोड़कर घरेलू काम, भाई-बहनों की जिम्मेदारी या कम उम्र में विवाह का बोझ उठाना पड़ता है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

लड़कियों के शिक्षा से दूर रहने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं—गरीबी, माता-पिता की अशिक्षा, घरेलू कलह, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, कम उम्र का विवाह, आर्थिक दबाव व कर्ज, स्कूलों की दूरी और आवागमन सुविधाओं की कमी प्रमुख बाधाएँ हैं। कुछ परिवारों में आज भी यह पुरानी सोच मौजूद है कि “लड़की पढ़-लिखकर क्या करेगी?” ऐसी सोच लड़कियों के भविष्य को अंधकार की ओर धकेल देती है।

शिक्षा से वंचित लड़की न केवल व्यक्तिगत रूप से, बल्कि परिवार और समाज—दोनों स्तरों पर पिछड़ेपन का कारण बनती है। जबकि शिक्षित लड़की स्वस्थ परिवार, शिक्षित बच्चों और आर्थिक आत्मनिर्भरता की नींव रखती है—यह तथ्य आज भी समाज पूरी तरह समझ नहीं पाया है।

शिक्षित लड़की में पूरे परिवार के भविष्य को संवारने की क्षमता होती है। वह अपने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पालन-पोषण के प्रति अधिक जागरूक और जिम्मेदार होती है। कम उम्र का विवाह, कुपोषण और प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु जैसे सामाजिक मुद्दों के समाधान में लड़कियों की शिक्षा की भूमिका निर्णायक है। जब महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं, तो परिवार की आय बढ़ती है और गरीबी का चक्र टूटता है। आज आईएएस, आईपीएस, केएएस, सीए, पायलट, वकील, न्यायाधीश, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक, खिलाड़ी और सैनिक—हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी क्षमता सिद्ध की है। इन सभी उपलब्धियों के पीछे शिक्षा की शक्ति ही प्रमुख कारण है।

लड़कियों की शिक्षा के साथ-साथ लड़कों की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लड़कों को केवल पेशेवर कौशल ही नहीं, बल्कि मूल्यों पर आधारित शिक्षा देना भी अत्यावश्यक है। लैंगिक समानता, महिलाओं का सम्मान, सामाजिक जिम्मेदारी और कानूनी जागरूकता जैसे विषय यदि बचपन से सिखाए जाएँ, तभी भेदभाव-मुक्त समाज का निर्माण संभव है।

स्कूलों में लैंगिक समानता के पाठ, सहपाठियों के साथ समान व्यवहार तथा खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों में लड़कियों और लड़कों को समान अवसर देना आवश्यक है। इससे आने वाली पीढ़ी में समानता का मूल्य स्वाभाविक रूप से विकसित होगा।

लड़कियों और लड़कों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक योजनाएँ लागू की हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है। निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, स्कूल यूनिफॉर्म, दोपहर का गर्म भोजन, छात्रवृत्तियाँ, आवासीय विद्यालय और लड़कियों के छात्रावास जैसे कदमों से शिक्षा में बच्चों की भागीदारी बढ़ी है।

हालाँकि केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं; उनके लाभों का पात्र बच्चों तक पहुँचना भी उतना ही जरूरी है। इस संदर्भ में स्थानीय निकायों, स्कूल प्रशासन, शिक्षकों और अभिभावकों की जिम्मेदारी अत्यधिक बढ़ जाती है। बच्चों की शिक्षा में माता-पिता की भूमिका निर्णायक होती है। घर के स्तर पर ही जब लड़की और लड़के के बीच भेदभाव समाप्त होगा, तभी समाज के स्तर पर परिवर्तन संभव है। दोनों बच्चों को समान प्रेम, प्रोत्साहन और अवसर देने से उनमें आत्मविश्वास विकसित होता है। “बेटी पराया धन है” जैसी पुरानी सोच छोड़कर “बेटी शक्ति है” का दृष्टिकोण अपनाने का यही समय है।

केवल बच्चों को स्कूल भेज देना पर्याप्त नहीं; उनकी पढ़ाई में रुचि लेना, शिक्षकों से संवाद रखना और बच्चों की क्षमताओं को पहचानकर उन्हें विकसित करना माता-पिता की जिम्मेदारी है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि समाज के निर्माता होते हैं। बच्चों में समानता, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का विकास करने में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, अभिभावक-शिक्षक बैठकें और सामुदायिक outreach के माध्यम से शिक्षा का महत्व घर-घर तक पहुँचाया जाना चाहिए।

सामाजिक संगठन, गैर-सरकारी संस्थाएँ और धार्मिक संस्थाएँ भी शैक्षिक जागरूकता में सक्रिय भूमिका निभाएँ। कम उम्र के विवाह, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों और बाल श्रम के विरुद्ध जन-जागरूकता समय की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।

जब लड़की और लड़के के बीच भेदभाव समाप्त कर सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जाएगी, तभी एक समान, न्यायपूर्ण और विकसित समाज का निर्माण संभव होगा। शिक्षा गरीबी उन्मूलन का हथियार, अज्ञान के अंधकार में प्रकाश और विकास की दिशा देने वाली शक्ति है।

आज हम बच्चों की शिक्षा में जो निवेश करते हैं, वही कल भारत के भविष्य की नींव बनता है। इसलिए “सबके लिए शिक्षा, सबके लिए समान अवसर” के संकल्प को साकार करने हेतु सरकार, समाज और प्रत्येक नागरिक को मिलकर कार्य करना होगा। लड़की–लड़का भेदभाव से मुक्त शिक्षा ही मजबूत भारत की सुरक्षित आधारशिला है—इस सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए।

 

लेखक: शबी़र अहमद, श्रीनिवासपुर

Source: Haqeeqat Time