शादी के अवसर पर जाति-बिरादरी की अवधारणा और इस्लामी शिक्षाएँ
हाल के दिनों में इसी कॉलम में हमने आधुनिक जीवन-शैली और बढ़ते तलाक़ के मामलों पर चर्चा की थी तथा शरीअत की रोशनी में कुछ मार्गदर्शन प्रस्तुत किया था। इसके बाद पाठकों के दर्जनों फ़ोन और संदेश प्राप्त हुए। अधिकांश लोगों का कहना था कि तलाक़ के कारणों में एक बड़ा कारण यह भी है कि निकाह और शादी के समय अब हर जगह कठिन परिस्थितियों और सामाजिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। समाज में पैदा होने वाली कुछ समस्याएँ गंभीर रूप लेती जा रही हैं। कई स्थानों पर इस मसले को झूठी प्रतिष्ठा (नाक का सवाल) बना लिया गया है और दीन व शरीअत की हिदायतों को आसानी से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। आज की यह लेखनी इसी समस्या पर मार्गदर्शन के उद्देश्य से लिखी जा रही है।
कुछ वर्ष पहले एक मुस्लिम संगठन ने देश के विभिन्न शहरों में एक सर्वे कराया था कि सबसे अधिक अविवाहित और तलाक़शुदा महिलाएँ किस शहर में हैं। रिपोर्ट के अनुसार हैदराबाद इस सूची में सबसे ऊपर था। लाखों महिलाएँ ऐसी हैं जिन्हें कोई उपयुक्त रिश्ता नहीं मिल सका; रिश्तों के इंतज़ार में उनकी उम्र ढल गई। और यदि किसी तरह शादी हो भी जाती है तो वह रिश्ता टिक नहीं पाता, बात ख़ुला और तलाक़ तक पहुँच जाती है। शायद इसी कारण तलाक़शुदा महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।
इस सिलसिले में सबसे पहली और बुनियादी बात यह है कि इस्लाम में जाति और बिरादरी के भेद का कोई स्थान नहीं है। दौर-ए-रिसालत में गैर-कुफ़ू (बराबरी से बाहर) शादियाँ आम थीं। यद्यपि जाहीलीयत के प्रभाव के कारण कुछ लोग अपने नसब (वंश) को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन समझते थे, लेकिन जैसे-जैसे इस्लाम की रोशनी फैली और ईमान दिलों में रासिख़ होता गया, नसब पर गर्व करने की भावना मिटती चली गई। उसकी जगह ज़ुह्द और तक़वा को श्रेष्ठता का मापदंड माना जाने लगा। रसूलुल्लाह ﷺ की स्पष्ट शिक्षा थी कि नाम और नसब पर घमंड करने के बजाय इस्लाम और तक़वा को महत्व दिया जाए, और जब भी कोई उपयुक्त रिश्ता मिले तो जाति-बिरादरी का लिहाज़ किए बिना निकाह कर दिया जाए।
हज़रत अबू हुरैरा رضي الله عنه से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जब तुम्हारे पास किसी ऐसे व्यक्ति का रिश्ता आए जिसके दीन और अख़लाक़ से तुम संतुष्ट हो, तो उससे निकाह कर दो। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में बड़ा फ़ितना और फ़साद पैदा होगा।” सहाबा ने पूछा: “चाहे वह ग़रीब हो या बराबरी का न हो?” आपने तीन बार फ़रमाया: “जब तुम्हारे पास ऐसे व्यक्ति का रिश्ता आए जिसके दीन और अख़लाक़ से तुम राज़ी हो, तो उससे निकाह कर दो।”
दो-तीन वर्ष पहले मुझे स्वयं इस विषय में एक कड़वा अनुभव हुआ। हमारे एक ससुराली रिश्तेदार हैं, जो आलिम-ए-दीन भी हैं और पूरा परिवार धार्मिक माना जाता है। संयोग से वे एक दीनि संस्था के ज़िम्मेदार भी हैं। उसी परिवार की एक लड़की का रिश्ता ऐसे लड़के से तय हो गया जो दूसरी बिरादरी से था। सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं और शादी में कुछ ही दिन शेष थे। तभी उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह रिश्ता नहीं हो सकता, क्योंकि लड़का हमारी बराबरी और हमारी बिरादरी का नहीं है। जबकि वह लड़का शहर के एक प्रतिष्ठित संस्थान से फ़ाज़िल और मुफ़्ती था, केवल उसकी बिरादरी अलग थी। लड़की उनके भाई की थी, इसलिए उन्होंने इस रिश्ते को तोड़ने के लिए पूरा दबाव डाला। यहाँ तक कि एक बैठक में वे आपे से बाहर हो गए और तमाम दलीलों को ठुकरा दिया। क़ुरआन-ओ-हदीस पर आधारित तर्कों की उनके सामने कोई अहमियत नहीं रही। दारुल उलूम देवबंद से फ़तवा भी मंगाया गया, जिसे उन्होंने मानने से इनकार कर दिया। अंततः रिश्ता टूटा नहीं और तय समय पर अल्हम्दुलिल्लाह शादी हो गई, लेकिन उनके घर का कोई व्यक्ति उसमें शामिल नहीं हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे और दीनदार कहे जाने वाले लोग भी इस जहालत-भरे माहौल से प्रभावित हैं, और किसी न किसी स्तर पर ब्राह्मणवादी सोच उनमें मौजूद है।
इस्लाम में जिस कफ़ाअत (बराबरी) का विचार रखा गया है, उसका अर्थ यह है कि पति-पत्नी नैतिक स्थिति और सामाजिक हालात में इस तरह हों कि आपसी मानसिक सामंजस्य आसानी से पैदा हो सके, जो शादी की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह मसला दीन से अधिक सामाजिक है, लेकिन कुछ लोग इसे अहंकार का प्रश्न बना लेते हैं, जो किसी भी तरह उचित नहीं है। ऐसे रवैयों और सोच की हौसला-शिकनी होनी चाहिए।
इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा رحمه الله फ़रमाते हैं कि यदि कोई क़ुरैशी महिला किसी आज़ाद किए गए ग़ुलाम से शादी पर राज़ी हो और वह महर-ए-मिस्ल अदा कर सकता हो, तो हाकिम को उसकी शादी का आदेश देना चाहिए; और यदि वली तैयार न हो तो क़ाज़ी उसकी शादी कराए। यही राय इमाम मालिक और इमाम शाफ़ेई की भी है। रसूलुल्लाह ﷺ ने स्वयं अपनी फूफी की बेटी हज़रत ज़ैनब का निकाह अपने आज़ाद किए हुए ग़ुलाम हज़रत ज़ैद से कराया। इसी तरह हज़रत अबू हुज़ैफ़ा ने अपने ग़ुलाम सालिम का निकाह एक क़ुरैशी महिला से कराया। हज़रत बिलाल ने हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ की बहन से शादी की। हज़रत हुसैन ने अपनी एक लौंडी को आज़ाद कर उससे निकाह किया। जब हज़रत मुआविया رضي الله عنه ने इस पर आपत्ति की तो हज़रत हुसैन ने कहा कि अल्लाह ने इस्लाम के ज़रिये नीच को ऊँचा कर दिया और हमारी कमियों को दूर कर दिया; अब किसी मुसलमान को केवल गुनाह पर मलामत की जा सकती है, और जाहीलीयत ही निंदनीय है।
हज़रत अली رضي الله عنه से जब शादी में कफ़ाअत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस्लाम और ईमान लाने के बाद सभी लोग—अरब-अजम, क़ुरैशी-हाशिमी—एक-दूसरे के कफ़ू हैं। अनेक सहाबा और ताबेईन का भी यही मत था कि कफ़ाअत का वास्तविक आधार केवल दीन है, न कि नसब, पेशा या धन-दौलत।
क़ुरआन-ए-करीम में स्पष्ट रूप से कहा गया है: “ऐ लोगों! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें क़ौमें और क़बीले बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। निश्चय ही अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वही है जो सबसे अधिक परहेज़गार है।” यह आयत और अनेक हदीसें नसब पर गर्व की सोच को सिरे से ख़ारिज करती हैं।
दौर-ए-रिसालत में गैर-कफ़ू शादियों के असंख्य उदाहरण मिलते हैं, लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ ने कभी यह नहीं फ़रमाया कि ये शादियाँ केवल विशेष मामलों के लिए हैं। यदि ऐसा होता तो आप ﷺ अवश्य स्पष्ट करते।
इस पूरी चर्चा का सार यह है कि शादी और निकाह को आसान बनाने के लिए समय पर शादी की चिंता करनी चाहिए। हमारे समाज में अक्सर बेटियों के निकाह पर शिक्षा और नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है, जिसके कारण शादी की उम्र निकल जाती है और समाज में अनेक समस्याएँ पैदा होती हैं, जिनमें अवैध संबंध और अन्य गुनाह भी शामिल हैं। क़यामत के दिन माता-पिता और अभिभावकों से इस बारे में भी सवाल किया जाएगा।
लेखक: सरफ़राज़ अहमद क़ासमी, हैदराबाद
(लेखक प्रसिद्ध पत्रकार हैं और ऑल इंडिया समाज बचाओ तहरीक के महासचिव हैं)
लेखक के विचारों से संस्था का सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Source: Haqeeqat Time (Translated in hindi)







