न्यायिक अन्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल: उमर ख़ालिद मामला फिर सुर्खियों में
नई दिल्ली:
दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए मामले में उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न मिलने के बाद न्यायिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर बहस तेज़ हो गई है। आलोचकों का कहना है कि बिना ट्रायल शुरू हुए वर्षों तक आरोपियों को जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या पाँच करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिससे न्याय मिलने में असाधारण देरी हो रही है। कई मामलों में लोग वर्षों तक जेल में रहने के बाद निर्दोष साबित होते हैं। इसी पृष्ठभूमि में उमर ख़ालिद का मामला न्यायिक देरी और कठोर क़ानूनों के इस्तेमाल का प्रतीक बनता जा रहा है।
उमर ख़ालिद सितंबर 2020 से तिहाड़ जेल में बंद हैं। अब तक उनके मामले में नियमित ट्रायल शुरू नहीं हो सका है। परिवार का कहना है कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है और दंगों के समय वह दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे। इसके बावजूद ज़मानत से इनकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या ज़मानत अब अधिकार नहीं, बल्कि रियायत बनती जा रही है।
इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। दिसंबर 2025 में आठ अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर यूएपीए जैसे कठोर क़ानूनों के इस्तेमाल पर चिंता जताई थी। सांसदों ने कहा था कि राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए ऐसे क़ानूनों का प्रयोग किसी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है।
वहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव को लेकर भी रिपोर्टें सामने आई हैं। फ्री स्पीच कलेक्टिव की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर 14,875 हमले दर्ज किए गए। इनमें पत्रकारों की गिरफ़्तारी, सोशल मीडिया सेंसरशिप और इंटरनेट नियंत्रण के मामले शामिल हैं।
कानून विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि असहमति को अपराध माना जाने लगा और ट्रायल से पहले ही लंबी कैद को सामान्य बना दिया गया, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती होगी। उनका मानना है कि उमर ख़ालिद का मामला केवल एक व्यक्ति की आज़ादी से जुड़ा नहीं, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की कसौटी बन चुका है।







