बेलगावी में नामफलक (साइनबोर्ड) विवाद एक बार फिर गरमा गया है। महाराष्ट्र एकीकरण समिति (MES) ने सरकार को 22 जून तक 60-40 भाषा नीति लागू करने का अल्टीमेटम दिया है। समिति का कहना है कि सीमा विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के बावजूद बेलगावी में साइनबोर्डों पर 100 फीसदी कन्नड़ भाषा को अनिवार्य किया जा रहा है, जो सरकार की घोषित 60-40 नीति के खिलाफ है।

समिति ने मांग की है कि सरकारी और निजी संस्थानों के नामफलक पर 60 प्रतिशत कन्नड़ तथा 40 प्रतिशत मराठी और अंग्रेजी भाषा का उपयोग सुनिश्चित किया जाए। यदि 22 जून तक यह नीति लागू नहीं की गई, तो महाराष्ट्र एकीकरण समिति के नेतृत्व में मराठी भाषी नागरिक बड़ा आंदोलन करेंगे। इसी संबंध में आज जिला प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा गया।

महाराष्ट्र एकीकरण समिति के अध्यक्ष प्रकाश मरगाले ने कहा कि 1990 के दशक से बेलगावी के सरकारी और निजी कार्यालयों के साइनबोर्डों पर कन्नड़ के साथ मराठी और अंग्रेजी भाषाओं को भी स्थान दिया जाता रहा है। सीमा विवाद के अंतिम निर्णय तक यही व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि नौ महीने पहले हुई चर्चा के दौरान जिला प्रशासन ने जो आश्वासन दिया था, उसे अब तक पूरा नहीं किया गया है। इसलिए 22 जून तक कार्रवाई नहीं हुई तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।

समिति के सचिव और पूर्व विधायक मनोहर किणेकर ने कहा कि पहले सभी सरकारी और निजी कार्यालयों में कन्नड़, मराठी और अंग्रेजी भाषा में नामफलक होते थे, लेकिन अब कुछ संगठन और अधिकारी दबाव बनाकर मराठी भाषा के फलक हटवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब सीमा विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब इस तरह की अनिवार्यता लागू करना कानून के खिलाफ है।

पूर्व महापौर रेणु किल्लेकर ने कहा कि कई बार बेलगावी को कर्नाटक का अभिन्न अंग बताते हुए तथा महाजन आयोग की रिपोर्ट को अंतिम मानने वाले प्रस्ताव नगर निगम में लाने की कोशिश की गई है। लेकिन चूंकि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए ऐसे प्रस्ताव पारित करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि मराठी भाषी नगरसेवक मराठी समाज का पक्ष मजबूती से रखें और विवाद का समाधान कानूनी लड़ाई के जरिए ही किया जाए।

युवा नेता शुभम शेलके ने कहा कि नगर निगम में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों से बेलगावी की वास्तविक स्थिति नहीं बदलेगी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मराठी भाषी सदस्य सीमा विवाद के समर्थन में प्रस्ताव लाते हैं तो सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने का हवाला दिया जाता है, लेकिन मराठी भाषियों के विरोध में प्रस्ताव पारित होने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती। उन्होंने कहा कि पूरे कर्नाटक में कन्नड़ अनिवार्यता को लेकर असंतोष बढ़ रहा है और सरकार को सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए अपनी भाषा को भी समृद्ध बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

इस मौके पर पूर्व महापौर सरिता पाटील, दिगंबर पाटील, मालोजीराव अष्टेकर, एडवोकेट अमर यल्लूरकर समेत बड़ी संख्या में मराठी भाषी नागरिक मौजूद रहे।