ज़ुल्मी सरकार और कॉकरोच जनता: जब एक तंज़ युवाओं की आवाज़ बन गया

लोकतंत्र में सरकार जनता के वोट से बनती है और जनता की ख़िदमत के लिए वजूद में आती है। सत्ता की कुर्सी किसी शख़्स, पार्टी या खानदान की निजी मिल्कियत नहीं होती, बल्कि यह अवाम की अमानत होती है। लेकिन कई बार सत्ता के गलियारों में बैठे लोग यह भूल जाते हैं कि उनकी असली ताकत जनता है।

जब जनता के मसलों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, नौजवानों की जायज़ मांगों को गंभीरता से नहीं लिया जाता और हक़ की आवाज़ उठाने वालों को दबाने की कोशिश होती है, तब ख़ामोशी धीरे-धीरे एक तहरीक का रूप ले लेती है।

“कॉकरोच जनता पार्टी” की पहचान भी एक ऐसे ही तंज़िया वाकये से जुड़ी है, जिसने नौजवानों में मज़ाक के साथ-साथ शऊर और बेदारी की नई लहर पैदा कर दी। अदालत में कही गई एक बात सिर्फ़ कुछ लम्हों का मज़ाक बनकर नहीं रह गई, बल्कि युवाओं ने उसी को अपनी बेबसी, अपने मसलों और अपने हक़ की आवाज़ बना लिया। जिस लफ़्ज़ को शायद तंज़ और मज़ाक के तौर पर इस्तेमाल किया गया था, उसे नौजवानों ने अपनी पहचान, इत्तेहाद और मुज़ाहमत की निशानी बना दिया।

धीरे-धीरे यह तंज़ एक अवामी तहरीक में तब्दील हो गया। नौजवान जंतर-मंतर पर जमा हुए और पूरी तरह अमन, इंतिज़ाम और संवैधानिक तरीके से अपने हक़ की आवाज़ बुलंद की। उनका मक़सद किसी शख़्स या इदारे के खिलाफ़ नफ़रत फैलाना नहीं था, बल्कि अपनी जायज़ मांगों को हुकूमत तक पहुँचाना और इंसाफ़ हासिल करना था।

उनके इत्तेहाद, सब्र और लगातार जद्दोजहद ने सरकार पर दबाव बनाया और आख़िरकार नौजवान अपने हक़ हासिल करने में कामयाब रहे।

यह वाकया साबित करता है कि जनता को कभी कमज़ोर या बेअसर नहीं समझना चाहिए। अवाम ख़ामोश ज़रूर रह सकती है, लेकिन बेअहसास नहीं होती। जब सब्र का पैमाना भर जाता है और लोग शऊर, इत्तेहाद और ज़िम्मेदारी के साथ खड़े होते हैं, तो एक छोटा-सा मज़ाक भी बड़ी तहरीक और मज़बूत पैग़ाम बन जाता है।

इसी एहसास को लेखक ने अपनी नज़्म “गर्मी की राम कहानी!” में कुछ यूँ बयां किया है—

गर्मी की राम कहानी!
नको पूछो यारो, इस जून की गर्मी का हाल!
दिमाग ऐसा तप रहा,
जैसे तंदूर में कबाब सिक रहा हो।

धूप इस कदर बरस रही है कि
धरती का सीना झुलस गया,
पेड़ों की छाँव सिमट गई,
हवा भी लू के डर से
ख़ामोशी का दामन पकड़कर
कहीं जा छुपी।

मगर यारो…
ये तपिश सिर्फ़ मौसम की नहीं,
कुछ आग दिलों में भी सुलग रही है,
कुछ लू उन गलियारों से भी उठ रही है,
जहाँ इख़्तियार के साये
बहुत लंबे हो गए हैं।

प्यासी सिर्फ़ धरती नहीं,
उम्मीद भी प्यासी है,
सवाल भी प्यासे हैं,
और इंसाफ़ की राह तकती निगाहें भी।

ऐ मौला!
अपनी रहमत की ऐसी बारिश बरसा
कि सिर्फ़ सूखी ज़मीन ही नहीं,
सूखे दिल भी हरे-भरे हो जाएँ।
नफ़रत की गर्मी मिट जाए,
मोहब्बत की ठंडी हवा चल पड़े,
और सोए हुए ज़मीर जाग उठें।

यह नज़्म सिर्फ़ जून की गर्मी का ज़िक्र नहीं करती, बल्कि उस सामाजिक और सियासी माहौल की भी तस्वीर पेश करती है, जिसमें आम आदमी और नौजवान अपने मसलों के साथ ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। जब सत्ता जनता की फ़रियाद नहीं सुनती, तो सवाल पैदा होते हैं, और जब सवालों का जवाब नहीं मिलता, तो वही सवाल एक सामूहिक आवाज़ बन जाते हैं।

सरकार चाहे कितनी भी ताक़तवर क्यों न हो, उसे यह याद रखना चाहिए कि सत्ता का असली मालिक जनता है। सरकार जनता की होती है, जनता सरकार की नहीं। हुकूमत का मक़सद जनता पर हुकूमत करना नहीं, बल्कि उनकी ख़िदमत करना, उनके हक़ की हिफ़ाज़त करना और उनके मसलों का हल निकालना है।

ज़ुल्म, बेपरवाही और ताक़त के दम पर जनता की आवाज़ को कुछ वक़्त के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए ख़ामोश नहीं किया जा सकता।

“कॉकरोच जनता पार्टी” की यह प्रतीकात्मक तहरीक नौजवानों के लिए एक पैग़ाम है कि अपने हक़ के लिए नफ़रत या हिंसा नहीं, बल्कि शऊर, इत्तेहाद, सब्र और अमन के रास्ते पर चलना ज़रूरी है। जंतर-मंतर पर उठी आवाज़ ने यह साबित कर दिया कि जागरूक, संगठित और शांतिपूर्ण जनता अपने जायज़ हक़ हासिल कर सकती है।

वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। धूप कितनी भी तेज़ हो, शाम को ढलना ही पड़ता है। रात कितनी भी लंबी हो, सुबह का उजाला अपना रास्ता बना ही लेता है। उसी तरह ज़ुल्म, बेहिसी और नाइंसाफ़ी का दौर भी हमेशा कायम नहीं रहता। हुकूमतें आती-जाती रहती हैं, लेकिन जनता की ताक़त और हक़ की आवाज़ हमेशा ज़िंदा रहती है।

“ज़ुल्मी सरकार और कॉकरोच जनता” सिर्फ़ एक तंज़िया शीर्षक नहीं, बल्कि लोकतंत्र का एक पैग़ाम है कि सरकार जनता की है, जनता ही उसकी असली ताक़त है। और जब नौजवान अपने हक़ के लिए शऊर, इत्तेहाद और अमन के साथ खड़े होते हैं, तो एक छोटा-सा मज़ाक भी बड़ी तहरीक में बदल सकता है।

लेखक: रहबर तमापुरी

Source: Haqeeqat Times