मराठी को सड़क पर नहीं, स्कूलों में बचाइए

मराठी बचाने के नारे बहुत, मराठी स्कूल बचाने की चिंता कितनी?

मुंबई में स्कूलों और विद्यार्थियों की घटती संख्या ने भाषा संरक्षण की राजनीति पर खड़े किए सवाल

 

मराठी भाषा के संरक्षण और विकास की बात महाराष्ट्र की राजनीति में नई नहीं है। कभी मराठी को रोजगार और सरकारी कामकाज से जोड़ने का अभियान चलता है, कभी मुंबई में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी जानने की शर्त पर जोर दिया जाता है और कभी मराठी अस्मिता को राजनीतिक बहस का केंद्र बना दिया जाता है। हाल के दिनों में बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त के एक बयान ने भी इसी बहस को फिर से जीवित कर दिया। ठाणे में दही हांडी के एक कार्यक्रम में उन्होंने मजाक में कहा कि येरवडा जेल में छह साल रहने के बावजूद वह मराठी नहीं सीख सके। इस पर आपत्ति जताई गई तो उन्होंने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से बात कर स्पष्टीकरण दिया, माफी मांगी और कहा कि वह मराठी जानते और बोलते हैं तथा उनके परिवार का मुंबई और महाराष्ट्र से गहरा संबंध है।

यह घटना अपने आप में मामूली या एक अभिनेता के मजाक का मामला हो सकती है, लेकिन इसने एक बड़े सवाल को फिर सामने ला दिया है: अगर मराठी वास्तव में महाराष्ट्र की पहचान, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी की बुनियादी भाषा है, तो इसकी सबसे मजबूत नींव यानी मराठी माध्यम के स्कूल लगातार कम क्यों हो रहे हैं?

एक तरफ सरकार और राजनीतिक दल मराठी बोलने पर जोर दे रहे हैं, दूसरी तरफ अभिभावक खुद अपने बच्चों को मराठी माध्यम से दूर ले जा रहे हैं। क्या केवल ड्राइवरों, दुकानदारों या दूसरे क्षेत्रों के कर्मचारियों से मराठी सीखने की मांग करके भाषा को सुरक्षित रखा जा सकता है, जबकि मराठी समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम को प्राथमिकता दे रहा है?

उपलब्ध आंकड़े इस विरोधाभास को और स्पष्ट करते हैं। मुंबई में 2019-20 के दौरान मराठी माध्यम के लगभग 461 स्कूल थे, जो 2024-25 तक घटकर 421 रह गए। यानी कुछ ही वर्षों में 40 स्कूल कम हो गए। विद्यार्थियों की संख्या में गिरावट इससे भी ज्यादा चिंताजनक है। एक समय मराठी माध्यम के स्कूलों में 1 लाख 35 हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते थे, लेकिन बाद के आंकड़ों में यह संख्या लगभग 85,469 तक पहुंच गई। यानी करीब 50 हजार विद्यार्थियों का अंतर पैदा हो गया।

मुंबई महानगरपालिका के स्कूलों की स्थिति भी इसी ओर इशारा करती है। 2014-15 में बीएमसी के मराठी माध्यम के स्कूलों की संख्या लगभग 368 थी, जो बाद के वर्षों में घटकर करीब 262 रह गई। दक्षिण मुंबई समेत विभिन्न क्षेत्रों में कई मराठी स्कूल बंद हो चुके हैं या बेहद कम विद्यार्थियों के साथ केवल नाममात्र के रह गए हैं। दादर के नाबर गुरुजी विद्यालय का उदाहरण भी इस संकट की तस्वीर पेश करता है, जहां छठी से दसवीं कक्षा तक विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम रह गई थी और स्कूल को तब तक जारी रखने का प्रयास किया जा रहा था, जब तक अंतिम विद्यार्थी दसवीं कक्षा पूरी न कर ले।

केंद्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों में भी मुंबई के मराठी माध्यम के स्कूलों की संख्या में कमी का उल्लेख सामने आया है। 2019-20 में जहां ऐसे स्कूलों की संख्या लगभग 380 बताई गई थी, वहीं 2023-24 में यह संख्या करीब 340 रह गई। विद्यार्थियों की संख्या भी लगभग 1 लाख 25 हजार से घटकर 98 हजार के आसपास पहुंच गई।

राज्य स्तर पर भी स्थिति अलग नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों मराठी माध्यम के स्कूलों के कम होने या बंद होने की खबरें सामने आई हैं, जबकि इसी दौरान सैकड़ों नए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल स्थापित हुए। एक रिपोर्ट के अनुसार, चार वर्षों में मराठी माध्यम के 624 स्कूल कम हुए, जबकि 426 नए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल जुड़े।

ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। हर बंद होने वाला स्कूल एक इमारत से कहीं अधिक मायने रखता है। उसके साथ एक मोहल्ला, एक शिक्षक, कई पीढ़ियों की यादें और भाषा से जुड़ा सामाजिक वातावरण भी कमजोर होता है। स्कूल केवल भाषा पढ़ाने की जगह नहीं होता, बल्कि भाषा के इस्तेमाल, संस्कृति, साहित्य और सामाजिक संबंधों को जीवित रखने वाली बुनियादी संस्था भी होता है। अगर मराठी माध्यम के स्कूल लगातार कम होते रहे तो केवल सरकारी कार्यालयों या परिवहन क्षेत्र में मराठी के इस्तेमाल से भाषा का भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकेगा।

अभिभावक मराठी माध्यम से दूर क्यों हो रहे हैं?

असल सवाल यह है कि अभिभावक मराठी माध्यम से क्यों दूर हो रहे हैं? इसका जवाब सिर्फ यह नहीं हो सकता कि अभिभावक अपनी मातृभाषा को पसंद नहीं करते। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग के बहुत से अभिभावक मानते हैं कि अंग्रेजी माध्यम से उनके बच्चों को उच्च शिक्षा, रोजगार, तकनीक, कॉरपोरेट क्षेत्र और वैश्विक अवसरों तक पहुंच आसान होगी। आज अभिभावकों के सामने प्रतिस्पर्धा का ऐसा माहौल है, जहां भाषा का चुनाव अक्सर भावनाओं के बजाय भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को देखकर किया जाता है।

ऐसी स्थिति में अगर सरकार मराठी माध्यम के स्कूलों को मजबूत बनाना चाहती है तो उसे पहले यह विश्वास पैदा करना होगा कि मराठी माध्यम में पढ़ने वाला बच्चा भी आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और वैश्विक स्तर के अवसर हासिल कर सकता है।

सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मराठी हमारी भाषा और हमारी पहचान है। अभिभावक यह भी पूछेंगे कि मेरे बच्चे की शिक्षा, रोजगार और भविष्य की गारंटी कहां है?

यहां मराठी माध्यम के स्कूलों की गुणवत्ता का सवाल भी महत्वपूर्ण है। कई सरकारी स्कूलों में भवन, बुनियादी सुविधाएं, शिक्षकों की उपलब्धता, आधुनिक शिक्षण संसाधन और स्कूल के वातावरण से जुड़े मुद्दे रहे हैं। दूसरी ओर कई निजी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल सुंदर इमारतों, वातानुकूलित कक्षाओं, आधुनिक विज्ञान प्रयोगशालाओं, कंप्यूटर सुविधाओं, स्मार्ट क्लास और बेहतर प्रचार के माध्यम से अभिभावकों को आकर्षित करते हैं।

जब अभिभावक दोनों स्कूलों की तुलना करते हैं तो वे सिर्फ भाषा नहीं देखते, बल्कि पूरा शैक्षणिक वातावरण देखते हैं।

यह भी सही है कि मराठी माध्यम के सभी स्कूल पिछड़े हुए नहीं हैं। कई सरकारी स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब, रोबोटिक्स, कंप्यूटर और अन्य आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। कुछ मराठी माध्यम के स्कूलों का दसवीं कक्षा का परिणाम भी उल्लेखनीय रहा है। लेकिन समस्या यह है कि इन सफलताओं को बड़े स्तर पर अभिभावकों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी प्रयास कम दिखाई देते हैं।

अगर कोई अच्छा मराठी माध्यम का स्कूल चुपचाप अच्छा काम करता रहे और उसके मुकाबले कोई निजी स्कूल लगातार अपना प्रचार करता रहे, तो अभिभावकों का झुकाव स्वाभाविक रूप से दूसरी ओर हो सकता है।

मराठी के नाम पर राजनीति करने वालों से सवाल

मराठी भाषा के संरक्षण के नाम पर राजनीति करने वाले दलों को इस बुनियादी सवाल का जवाब देना होगा कि मराठी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने व्यावहारिक रूप से क्या किया?

यह सवाल केवल सत्ता में मौजूद दल से नहीं, बल्कि विपक्ष और उन सभी राजनीतिक ताकतों से भी है जो मराठी अस्मिता को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं।

अगर मराठी वास्तव में राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है तो इस पहचान का पहला मोर्चा स्कूल होना चाहिए, न कि केवल सड़क पर भाषा के इस्तेमाल की मांग।

हाल ही में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी जानने के मुद्दे पर भी बहस हुई। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने मराठी के इस्तेमाल और चालकों द्वारा भाषा सीखने पर जोर दिया, जबकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तत्काल सख्त कार्रवाई के बजाय चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की मोहलत देने की बात कही।

स्थानीय भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित करने में कोई बुराई नहीं है। किसी भी राज्य में वहां की भाषा जानना सामाजिक संपर्क और रोजमर्रा की जिंदगी के लिए फायदेमंद है। लेकिन भाषा के विकास और भाषा के नाम पर भय पैदा करने के बीच एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।

अबू आसिम आजमी जैसे नेताओं का भी मत रहा है कि स्थानीय भाषा सीखने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हिंसा, धमकी या दबाव के जरिए भाषा थोपना स्वीकार्य नहीं है। यह सिद्धांत केवल मराठी के लिए नहीं, बल्कि हर भाषा के लिए होना चाहिए।

मराठी के मुद्दे को केवल गैर-मराठी भाषी लोगों के खिलाफ शिकायत बना देना भी वास्तविकता से बचना होगा। इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मराठी समाज के भीतर खुद मराठी भाषा का स्थान क्या रह गया है?

अगर मराठी परिवार अपने बच्चों को बड़े पैमाने पर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेज रहे हैं, अगर मराठी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या कम हो रही है और अगर कई मराठी स्कूल विद्यार्थियों की कमी से जूझ रहे हैं, तो इसके लिए केवल गैर-मराठी आबादी को जिम्मेदार ठहराना समस्या को गलत दिशा में ले जाएगा।

भाषा आदेश से नहीं, इस्तेमाल से जीवित रहती है

भाषा केवल सरकारी आदेश से जीवित नहीं रहती। भाषा घर में बोली जाती है, स्कूल में पढ़ी जाती है, किताबों में जीवित रहती है, थिएटर के मंच पर सुनाई देती है, फिल्मों और टेलीविजन में इस्तेमाल होती है, बाजार और मोहल्ले में व्यवहार में आती है और नई पीढ़ी के रचनात्मक जीवन का हिस्सा बनती है।

मराठी को इसी पूरे दायरे में मजबूत करने की जरूरत है।

मराठी साहित्य का इतिहास भारतीय भाषाओं के साहित्य में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। संत परंपरा से लेकर आधुनिक मराठी उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक और आलोचना तक एक विशाल साहित्यिक विरासत मौजूद है। मराठी के महान लेखकों और कवियों ने सामाजिक सुधार, जाति व्यवस्था, गरीबी, महिलाओं, मजदूरों, शहरी जीवन और मानवीय रिश्तों जैसे विषयों पर गहरा काम किया है।

यह साहित्य केवल मराठी बोलने वालों की संपत्ति नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।

इसी तरह मराठी रंगमंच ने भी भाषा को जीवित रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। मराठी थिएटर की परंपरा ने न केवल बेहतरीन नाटककार और कलाकार पैदा किए, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक सवालों को जनता तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम भी उपलब्ध कराया।

मुंबई और महाराष्ट्र के थिएटरों में आज भी मराठी नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी को इस साहित्यिक और रंगमंचीय परंपरा से जोड़ने के लिए अधिक व्यवस्थित प्रयास की जरूरत है।

यहां एक और सवाल उठता है: क्या मराठी साहित्य और थिएटर की लोकप्रियता को स्कूल शिक्षा से जोड़ा जा सकता है?

क्यों न मराठी माध्यम के स्कूलों में आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ मराठी साहित्य, थिएटर, फिल्म, पत्रकारिता और रचनात्मक लेखन को भी नए रूप में पेश किया जाए? बच्चों को यह एहसास कराना होगा कि मराठी केवल परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि रचनात्मकता, रोजगार, अभिव्यक्ति और पहचान की भाषा भी हो सकती है।

दूसरी भाषाओं से दुश्मनी नहीं, मराठी को मजबूत करने की जरूरत

भाषा के संरक्षण का अर्थ यह नहीं कि दूसरी भाषाओं से दुश्मनी की जाए। महाराष्ट्र में उर्दू, हिंदी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और अन्य भाषाएं बोलने वाले लोग दशकों से रहते आए हैं। मुंबई की असली ताकत ही उसकी बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान है।

मराठी को मजबूत करने का सबसे अच्छा रास्ता दूसरी भाषाओं को कमजोर करना नहीं, बल्कि मराठी को इतना मजबूत, आधुनिक और सम्मानजनक बनाना है कि लोग उसे सीखना अपने लिए फायदेमंद समझें।

इस उद्देश्य के लिए सरकार को मराठी माध्यम के स्कूलों का व्यापक ऑडिट करना चाहिए। कहां विद्यार्थियों की संख्या कम हुई, कहां शिक्षकों की कमी है, कहां भवन खराब है, कहां अभिभावक स्कूल बदल रहे हैं और कहां स्कूल सफल है—इसका व्यवस्थित अध्ययन होना चाहिए।

सफल मराठी स्कूलों के मॉडल को दूसरे स्कूलों तक पहुंचाया जाए। शिक्षकों की रिक्तियां जल्द भरी जाएं, आधुनिक प्रयोगशालाएं और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तथा मराठी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के रास्तों की स्पष्ट जानकारी दी जाए।

साथ ही सरकार को यह भी सोचना होगा कि केवल मराठी माध्यम ही क्यों? मराठी को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भी एक मजबूत विषय के रूप में पढ़ाने की नीति बनाई जा सकती है।

अगर कोई बच्चा अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे मराठी से वंचित कर दिया जाए। उसे अच्छी मराठी पढ़ाई, लिखाई और बोलाई जाए तो भाषा का दायरा और व्यापक हो सकता है।

मराठी के लिए आकर्षण पैदा करना होगा

मराठी भाषा के विकास की सबसे प्रभावी मुहिम शायद वही होगी जिसमें किसी को धमकाया न जाए, बल्कि मराठी के प्रति आकर्षण पैदा किया जाए।

मराठी साहित्य की नई किताबें बच्चों तक पहुंचाई जाएं, अच्छे मराठी नाटक स्कूलों तक लाए जाएं, फिल्म और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गुणवत्तापूर्ण मराठी सामग्री तैयार की जाए, मराठी में विज्ञान और आधुनिक तकनीक की सामग्री सरल भाषा में उपलब्ध हो और युवाओं को यह बताया जाए कि मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा प्राप्त करना आधुनिक दुनिया से कट जाना नहीं है।

यह भी देखना होगा कि मराठी समाज खुद अपनी भाषा को लेकर कितना गंभीर है। अगर अभिभावक अपने बच्चों से घर में कम मराठी बोलें, मराठी किताबें न खरीदें, मराठी अखबार और पत्रिकाएं न पढ़ें और बच्चों को मराठी साहित्य व थिएटर से दूर रखें, तो केवल राजनीतिक भाषण भाषा को जीवित नहीं रख सकते।

भाषा के संरक्षण की पहली जिम्मेदारी उसके बोलने वालों पर ही होती है।

संजय दत्त की घटना से बड़ा है असली सवाल

संजय दत्त की घटना को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किसी अभिनेता का मजाक या किसी व्यक्ति की एक गलतफहमी भाषा के भविष्य का मुद्दा नहीं है।

असल मुद्दा यह है कि क्या हम मराठी को ऐसी भाषा बना रहे हैं जिसे लोग प्रेम, जरूरत और गर्व के साथ सीखें?

अगर जवाब हां है तो भाषा के लिए सख्ती की जरूरत कम हो जाएगी। और अगर जवाब नहीं है तो केवल राजनीतिक नारों से समस्या का समाधान नहीं होगा।

मराठी के नाम पर राजनीति करने वालों के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। वे भाषा को पहचान की टकराहट से निकालकर शिक्षा, साहित्य, थिएटर, रोजगार, तकनीक और आधुनिक शहरी जीवन से जोड़ सकते हैं।

उन्हें यह तय करना होगा कि मराठी का भविष्य केवल साइनबोर्ड, सरकारी आदेश या राजनीतिक सभा में है, या स्कूल की कक्षा, घर की बातचीत, किताब, थिएटर और नई पीढ़ी के सपनों में भी।

अंततः भाषा किसी आदेश से नहीं, इस्तेमाल से जीवित रहती है।

मराठी को अगर वास्तव में महाराष्ट्र के जीवन की भाषा बनाए रखना है तो उसके स्कूल बचाने होंगे, शिक्षकों को मजबूत करना होगा, साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाना होगा, मराठी थिएटर को नए दर्शक देने होंगे, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का खजाना मराठी में तैयार करना होगा और सबसे बढ़कर मराठी समाज के भीतर अपनी भाषा को लेकर आत्मविश्वास पैदा करना होगा।

आज सवाल यह नहीं है कि एक ऑटो ड्राइवर मराठी जानता है या नहीं। उससे कहीं बड़ा सवाल यह है कि कल मराठी माध्यम के स्कूल में कितने बच्चे होंगे, मराठी में कितनी किताबें पढ़ी जाएंगी, कितने युवा मराठी में रचनात्मक काम करेंगे और कितने परिवार अपने बच्चों के भविष्य के साथ मराठी भाषा को भी जोड़ेंगे।

अगर इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे गए तो मराठी के संरक्षण के ऊंचे दावों और जमीन पर बंद होते मराठी स्कूलों के बीच का विरोधाभास और गहरा होता जाएगा।

लेखक : जावेद जमालुद्दीन

Source: Haqeeqat Times