ज़्यादातर लोगों को लगता है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इतना ताक़तवर हो जाएगा कि हमारी नौकरियां खा जाएगा, क्योंकि वह इंसान का काम इंसान से ज़्यादा तेज़ और सस्ता कर देगा. जबकि यह आधी सच्चाई है, और आधा प्रोपगैंडा है, जो एआई के असली आर्थिक ख़तरे को छिपाने में मदद करता है.
इसे आप डोनाल्ड ट्रंप की खूबी कहें या कुछ और, मगर पिछले 12 सालों में यह पहली बार है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके धुर विरोधी एक बात पर सहमत दिख रहे हैं कि आर्थिक तौर पर आने वाला समय मुश्किल होने वाला है. इस मुश्किल वक्त में क्या कदम उठाने चाहिए, इस पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि संकट दोतरफ़ा है और हमारा सिस्टम उसके दूसरे पहलू पर ध्यान ही नहीं दे रहा.
यह दूसरा पहलू है आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई), जिसने हमें एक ऐसे चक्रव्यूह में घुसा दिया है जिसका पूरा नक्शा हमें खुद नहीं मालूम.
जब भी ‘एआई’ और ‘खतरा’ एक वाक्य में आते हैं, ज्यादातर लोगों को लगता है कि एआई इतना ताकतवर हो जाएगा कि हमारी नौकरियां खा जाएगा, क्योंकि वह इंसान का काम इंसान से ज़्यादा तेज़ और सस्ता कर देगा. इंटरनेट पर एआई पर बने शॉर्ट वीडियो देखने से लगता है कि बस कुछ ही महीनों में स्टीवन स्पीलबर्ग से लेकर राजमौली और बिल गेट्स से लेकर अज़ीम प्रेमजी के स्तर की रचनात्मकता दो लाइन के प्रॉम्प्ट पर बननी शुरू हो जाएगी. पर यह आधी सच्चाई है, और आधा प्रोपगैंडा है, जो एआई के असली आर्थिक खतरे को छिपाने में मदद करता है.
एआई मॉडल की परेशानियां
यह बात तय है कि एआई की वजह से तमाम नौकरियां जाएंगी, लेकिन फ़िलहाल इसकी बड़ी वजह एआई की क्षमता नहीं, बल्कि इसे बनाने और चलाने वाली कंपनियों की खराब आर्थिक नीति और लालच होगा. असली खतरा यह है कि एआई की अर्थव्यवस्था खुद किसी चिटफ़ंड या बबल जैसी बनती जा रही है, जिसमें उत्पाद भले ही अच्छा हो, बिज़नेस मॉडल बेहद खराब है.
आंकड़ों से समझिए. 2026 की हाल की रिपोर्टों के मुताबिक दुनिया की चार सबसे बड़ी टेक कंपनियां गूगल (अल्फाबेट), माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेज़न इस साल एआई इन्फ़्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स पर लगभग 725 अरब डॉलर खर्च करने की तैयारी में हैं, जो पिछले साल की तुलना में तकरीबन 77% ज़्यादा है. मगर इस लागत से कमाई कितनी होगी?
अगर हम दुनिया की सारी जेनरेटिव एआई कंपनियों का कुल मिला लें, तो भी एआई व्यापार की कुल कीमत (मुनाफ़ा नहीं) 15-20 अरब डॉलर सालाना के आसपास है. यानी जिस इंफ्रास्ट्रक्चर पर हर साल सैकड़ों अरब डॉलर झोंके जा रहे हैं, उसका सालाना कारोबार अभी उसकी लागत के पांच प्रतिशत के बराबर भी नहीं है.
इस बात पर एआई समर्थक कहते हैं कि यह सब रेल की पटरियां या समुद्र के नीचे इंटरनेट केबल बिछाने जैसा है. एक बार निवेश हो जाएगा, तो सालों फायदा मिलेगा. सुनने में अच्छा है, लेकिन यहां दो अहम तथ्य सोच-समझकर गायब कर दिए जाते हैं.
पहली बात, एआई का इंफ्रास्ट्रक्चर रेल की पटरियों जैसा स्थायी नहीं है; वह ज़्यादा एक ऐसे होटल जैसा है जिसे हर तीन-चार साल में रिनोवेट करके नया और पहले से बड़ा बनाना पड़ता है. चिप्स और सर्वर तीन-चार साल में पुराने पड़ जाते हैं. एआई डेटा सेंटर की तकनीकी उम्र खुद तीन-चार साल से ज़्यादा नहीं है. साथ ही, इनकी बिजली-पानी की खपत छोटे-मोटे शहरों के बराबर है.
अगर हम मान लें कि अगले दो तीन सालों में कोई ऐसी तकनीक आएगी कि ये समस्या चमत्कारिक रूप से हल हो जाएगी, तो भी दूसरी समस्या का कोई समाधान नहीं है.
एआई का कारोबार एक सर्कुलर सिस्टम है. मतलब मैं आपको हज़ार रुपये दूं, आप अपने दोस्त को वही हज़ार रुपये दें, और वो दोस्त मुझे हज़ार रुपये दें. कागज़ पर हम तीनों ने हज़ार रुपये कमाए, लेकिन वास्तविकता में हम वैसे के वैसे ही रहे.
माइक्रोसॉफ्ट ने ओपनएआई में लगभग 13 अरब डॉलर का निवेश किया. कागज़ों पर ओपनएआई के पास ढेर सारा पैसा दिखा, उसकी वैल्यूएशन आसमान छू गई. लेकिन चैटजीपीटी चलाने के लिए जो सुपरकंप्यूटर और सर्वर चाहिए, वे माइक्रोसॉफ्ट के ही एज़्योर क्लाउड पर हैं. ओपनएआई ने वही पैसा माइक्रोसॉफ्ट को क्लाउड फ़ीस के रूप में वापस दे दिया.
इसके बाद हर टेक कंपनी एनविडिया को चिप्स बनाने के लिए पैसा देती है. एनविडिया इस पैसे से माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न और गूगल से वापस सॉफ़्टवेयर और सर्वर खरीदती है. वेंचर कैपिटलिस्ट और शेयर बाज़ार लगातार इस सर्कल में नया पैसा डाल रहे हैं. नतीजा यह है कि दुनिया भर का निवेश गोल-गोल घूमते हुए कुछ साल चलने वाले चिप्स और डेटा सेंटरों में फंस रहा है.
इससे निकलने के लिए टेक कंपनियों ने बेहद मौलिक तरीका अपनाया कि ज़्यादा से ज़्यादा ग्राहक जोड़े जाएं. इसके लिए दो बुनियादी भावनाएं भड़कानी है- एक लालच और दूसरी असुरक्षा.
कई कारोबार और संस्थान नुकसान उठाकर भी एआई में निवेश कर रहे हैं, ताकि वे भविष्य में पीछे न रह जाएं. दूसरी ओर लोगों को उनकी सुंदर फोटो और वायरल होने वाली रील का लालच देकर जोड़ने की कवायद हो रही है.
मगर इससे मुश्किल हल नहीं होती, क्योंकि जनता अपनी फोटो को कार्टून में बदलकर इतना भी खुश नहीं होती कि हर महीने एक मोटी रकम सब्सक्रिप्शन में दें.
कंपनियों की पसोपेश
वहीं कंपनियों के मामले में समस्या अलग है. भारत में एक शुरुआती स्तर का कोडर 50 हज़ार रुपये महीने में खुशी-खुशी काम करता है और सीखते-सीखते बेहतर होता जाता है. यही काम एआई मॉडल से करवाने पर टोकन-खर्च, इंफ्रा,निगरानी और सुधार जोड़कर बिल डेढ़ से तीन लाख तक जा सकता है. साथ ही किसी गंभीर गलती या डेटा-लीक का जोखिम अलग से है.
निश्चित रूप से कुछ दशकों में इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत कम हो जाएगी, लेकिन तब तक कितने कारोबार यह दबाव सह पाएंगे कहना मुश्किल है. यही वजह है कि पिछले दो-तीन साल में जो हज़ारों नौकरियां गई, उनमें ज़्यादातर की वजह यह नहीं थी कि एआई उनसे बहुत बेहतर हो गया, बल्कि कंपनियों ने एआई में भारी पूंजी लगाने के लिए अपने पुराने बिज़नेस में कटौती की.
हाल की कई रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि जिन कंपनियों ने कस्टमर सपोर्ट और ऑपरेशन्स में तेजी से मानव कर्मचारियों की जगह चैटबॉट्स लगाए थे, उनमें से एक बड़ी हिस्सेदारी अब या तो इंसानों वापस रख रही है या हाइब्रिड मॉडल पर लौट रही है, क्योंकि फ़िलहाल एआई न तो बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी का सस्ता जादुई हथियार बना है, न ही गंभीर कामों में पूरी तरह भरोसेमंद विकल्प.
इतना सब सुनकर अगर लगे कि ‘तो फिर एआई तो उतना महान निकला ही नहीं जितना बताया जा रहा था’, तो बहुत जल्दी खुश होना भी ख़तरनाक है.
तकनीक समय के साथ बेहतर और सस्ती दोनों होती है. बहुत संभव है कि कुछ दशकों में इतने ताकतवर और छोटे एआई चिप बनने लगें कि बड़े-बड़े मॉडल आपके फोन, लैपटॉप या लोकल नेटवर्क पर चलें. मगर फ़िलहाल स्थिति ऐसी है कि 1950 का बीस एमबी हार्ड डिस्क और मिलियन डॉलर वाले तीन कमरे वाले कंप्यूटरों का समय चल रहा हो और लोग हर घर हर दफ़्तर में चार-चार कंप्यूटर लगाने को उतारू हों.
इतिहास के सबक
आर्थिक भविष्यवाणी अर्थशास्त्र वालों का काम है, लेकिन इतिहास के अपने अध्ययन से कुछ संभावनाओं को समझा जा सकता है. इतिहास यह बताता है कि क्रांतिकारी तकनीक और आर्थिक झटके अक्सर साथ-साथ चलते हैं.
19वीं सदी के ‘रेलवे की खोज’ के बाद भीषण मंदी आई, 20वीं सदी में बिजली-ऑटोमोबाइल-मास प्रोडक्शन के साथ वित्तीय उथल-पुथल आई, 1960-70 के दशक की अंतरिक्ष दौड़ के बाद का स्टैगफ्लेशन आया, फिर 1990 के दशक के आख़िर में डॉट-कॉम बूम और 2000 का क्रैश. बार-बार एक पैटर्न दिखता है कि दुनिया बदलने वाली तकनीक आती है, तो उसके बाद मंदी भी आती है. हां, यह मंदी आम लोगों के लिए होती है, बड़े लोगों के लिए नहीं.
2008 के सबप्राइम संकट के बाद अमेरिकी बैंकों को बेलआउट में अरबों डॉलर मिले, इन बैंक ने इससे घर और नौकरी गंवा चुके लोगों को कुछ नहीं लौटाया, बल्कि अपने टॉप मैनेजमेंट को करोड़ों डॉलर के बोनस दिए.
शायद यही कारण है कि एआई के वे इस्तेमाल सबसे कम चर्चा में हैं, जो दुनिया की सबसे बड़ी समस्याएं हल कर सकते हैं. जैसे, डीपमाइंड के अल्फाफोल्ड जैसे मॉडल ने प्रोटीन संरचना समझने का काम सालों से घटाकर महीनों-सालों में कर दिया. इससे कैंसर और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों का सस्ता इलाज संभव है.
इसी तरह खेती और क्लाइमेट मॉडलिंग में भी एआई काफ़ी मदद कर सकता है, जिससे दुनिया की भुखमरी कम हो सकती है.
इन सबके बीच भारत के लिए एक अतिरिक्त चिंता है. हमारी आईटी और ग्लोबल सर्विस इंडस्ट्री ने पिछले तीन दशकों में करोड़ों लोगों के जीवन स्तर बदले हैं. अगर एआई बबल फूटा या ग्लोबल टेक कंपनियों ने एआई घाटा संभालने के लिए बड़े स्तर पर छंटनी की, तो इसका सीधा असर भारत के लाखों कर्मचारियों की नौकरी, उनके पीएफ, उनके घर-कार की ईएमआई और हमारे निर्यात-आधारित सर्विस रेवेन्यू पर पड़ेगा.
फिर यहां जिन स्टार्टअप्स ने एआई और मशीन लर्निंग में अच्छा काम किया, उन्हें टैक्स और रेगुलेटरी माहौल ने इतना हतोत्साहित किया कि कई फाउंडर अपनी कंपनियां सिंगापुर, दुबई या कनाडा ले गए. हमारे यहां जिन स्टार्टअप ने कुछ अच्छा काम किया, तो सरकारी तंत्र ने उनकी लगभग पचास प्रतिशत कमाई रख ली.
अगर किसी स्टार्टअप का एआई उत्पाद ऐपल या आईबीएम जैसी कंपनी खरीदती है, तो वे फाउंडर के व्यक्तिगत अकाउंट में पैसा नहीं डालतीं. वे कंपनी या एसेट्स खरीदती हैं. इस पर स्टार्टअप को तुरंत 22% से 25% कॉरपोरेट टैक्स देना पड़ता है. इसके बाद जब फाउंडर्स इसमें से अपने लिए पैसे निकालते हैं, तो टैक्स स्लैब के हिसाब से 30% टैक्स बनता है.
अगर पर्सनल इनकम पांच-दस करोड़ से ऊपर है, तो 25% तक का सरचार्ज लग जाता है. इसके ऊपर 4% हेल्थ और एजुकेशन सेस लगता है. आज भले ही तमाम कंपनियों के पैकेट पर मेक इन इंडिया लिखा हो, लेकिन उनके मालिक सिंगापुर और कनाडा जैसे देशों में हैं.
अब आप किसी भी पार्टी या विचारधारा के हों, इतना मानना मुश्किल नहीं कि आने वाला दौर बेहद मुश्किल और उलझा हुआ है. इसलिए नहीं कि एआई की तकनीक में कोई बड़ी खराबी है, बल्कि इसलिए कि इस तकनीक का जिस बिज़नेस मॉडल के साथ घालमेल किया जा रहा है, उसके मूल में ही समस्या है.
ऐसे में दो साधारण-से सुझाव ही सबसे कारगर होने वाले हैं, पैसे बचाइए और अपना दिमाग तेज़ रखिए, ज़्यादा पढ़िए, बहस करिए, तकनीक को समझिए, और हर नई चीज़ को ‘सुनहरा भविष्य’ मानकर स्वीकार मत करिए. क्योंकि भूख से निपटने का असल समाधान भोजन उगाना और पकाना सीखना है, न कि फूड डिलीवरी ऐप इंस्टॉल करना.
Source: The Wire

