हाई लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज (HLC-DC): मुसलमानों के खिलाफ एक नई साज़िश?
सरकार को जिस बात की फ़िक्र करनी चाहिए, वह कोई काल्पनिक “जनसंख्या विस्फोट” नहीं है। असली सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले भारत में करोड़ों युवाओं के लिए रोज़गार कैसे पैदा किए जाएँ और आने वाले दो दशकों में बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी से पैदा होने वाली आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए।
लेकिन मोदी सरकार और उसके समर्थक लगातार यह नैरेटिव बना रहे हैं कि भारत में पड़ोसी देशों से बड़ी संख्या में “ग़ैर-क़ानूनी मुस्लिम घुसपैठिए” आ रहे हैं, जो देश की जनसंख्या संरचना को बदल रहे हैं। इसी दावे के आधार पर चुनावी प्रक्रियाओं और नागरिकता से जुड़े कई कदम उठाए जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकार या चुनाव आयोग ने आज तक कोई ठोस अध्ययन पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि देश में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवास हो रहा है।
इसी बीच 26 मई को केंद्र सरकार ने रिटायर्ड जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर की अध्यक्षता में “हाई लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज” का गठन किया। कमेटी की संरचना और उसे दिए गए कार्यों को देखने पर सवाल उठता है कि क्या इसका उद्देश्य वास्तव में जनसंख्या का अध्ययन करना है या फिर मुसलमानों को शक के घेरे में खड़ा करना?
कमेटी में जनसंख्या विज्ञान (Demography) का कोई विशेषज्ञ नहीं है। इसके सदस्य एक रिटायर्ड अफसर, एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी और सरकार से जुड़े आर्थिक सलाहकार हैं। आलोचकों का कहना है कि यह कमेटी पहले से तय निष्कर्षों को सही साबित करने के लिए बनाई गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कमेटी को यह जाँचने का काम नहीं दिया गया कि क्या वास्तव में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवास हो रहा है। इसके बजाय यह मानकर चला गया है कि ऐसा प्रवास हो रहा है, और अब उससे पैदा होने वाले “खतरों” का अध्ययन किया जाएगा। यही वजह है कि कई लोग इसे तथ्यों पर आधारित अध्ययन के बजाय एक राजनीतिक परियोजना मान रहे हैं।
क्या मुसलमानों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और जनगणना के आँकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।
भारत का Total Fertility Rate (TFR) यानी प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या लगातार घट रही है। आज भारत का TFR लगभग प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) के आसपास पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि देश जनसंख्या विस्फोट की तरफ़ नहीं बल्कि जनसंख्या वृद्धि की धीमी होती रफ़्तार की तरफ़ बढ़ रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि पिछले दो दशकों में मुस्लिम समुदाय का TFR हिंदुओं की तुलना में अधिक तेज़ी से घटा है। 2005-06 में मुस्लिम और हिंदू TFR के बीच जो अंतर था, वह बाद के वर्षों में काफ़ी कम हो गया। यानी मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर भी तेज़ी से नीचे आ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, महिलाओं का सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सुविधाएँ और आर्थिक विकास ही जनसंख्या नियंत्रण के सबसे प्रभावी साधन हैं। जहाँ विकास अधिक हुआ है, वहाँ सभी समुदायों में जन्मदर कम हुई है।
असली चुनौती क्या है?
दुनिया भर के जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार भारत की सबसे बड़ी चुनौती आने वाले वर्षों में आबादी का बढ़ना नहीं, बल्कि उसकी वृद्धि का धीमा होना और बुज़ुर्ग आबादी का बढ़ना होगा।
प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल Lancet के अध्ययन के अनुसार भारत की आबादी मध्य सदी तक बढ़ने के बाद धीरे-धीरे घटने लग सकती है। इसके साथ ही बुज़ुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ेगी, जिससे कामकाजी आबादी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
इसलिए सरकार को बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और बुज़ुर्ग आबादी की चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए। आलोचकों का कहना है कि जनसंख्या और अवैध प्रवास के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाना वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास है।
उनके मुताबिक़ भारत के सामने असली सवाल यह नहीं है कि आबादी कितनी बढ़ रही है, बल्कि यह है कि देश अपनी युवा शक्ति का उपयोग कैसे करेगा और भविष्य की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के लिए कैसे तैयार होगा।

