जम्हूरियत का मुस्तक़बिल, पार्लियामेंट का किरदार

अगर पार्लियामेंट ख़ामोश हो जाए, तो जम्हूरियत कितनी मज़बूत रह सकती है?

इख़्तियार, एहतेसाब और आइनी तवाज़ुन का बदलता मंज़रनामा

“भारत अब जम्हूरियत नहीं रहा।” कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी का यह बयान सिर्फ़ सियासी बहस छेड़ने के लिए नहीं था, बल्कि भारतीय जम्हूरियत के उन पहलुओं की तरफ़ इशारा था जिन पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। उनके मुताबिक़, अवामी नुमाइंदगी के इदारे अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं और रियासती इख़्तियार धीरे-धीरे दो बड़े स्तंभों—एक बेहद ताक़तवर इंतज़ामिया (Executive) और दूसरी अपने जजों की नियुक्ति में बड़ी भूमिका निभाने वाली अदलिया (Judiciary)—के बीच सिमटता नज़र आता है।

इस राय से इत्तेफ़ाक़ या इख़्तिलाफ़ हो सकता है, लेकिन इसके पीछे उठने वाले सवालों को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है।

जम्हूरियत सिर्फ़ वोट डालने का नाम नहीं है। अगर ऐसा होता, तो हर चुनाव कराने वाला मुल्क अपने-आप लोकतांत्रिक कहलाता। असल जम्हूरियत इख़्तियारों की तक़सीम, इदारों के बीच तवाज़ुन, पार्लियामेंट के ज़रिए हुकूमत की जवाबदेही और आइनी अख़लाक़ियात पर क़ायम होती है। जब इनमें से कोई एक स्तंभ कमज़ोर पड़ने लगता है, तो निज़ाम बाहर से तो वही दिखाई देता है, लेकिन उसकी रूह धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगती है।

पार्लियामेंट किसी भी हुकूमत की सिर्फ़ तस्दीक़ करने वाली मशीन नहीं है। यह वह सबसे अहम आइनी मंच है जहाँ हुकूमत को अवाम के सवालों का जवाब देना पड़ता है, क़ानूनों पर बहस होती है और मुल्क की दिशा तय की जाती है। मगर अफ़सोस की बात है कि आज यही इदारा शोर-शराबे, हंगामे और सियासी टकराव का शिकार बनता जा रहा है। बहस का दायरा सिमट रहा है, मुकम्मल चर्चा कम होती जा रही है और कई बार क़ानून जल्दबाज़ी में पास किए जाने के आरोप लगते हैं।

आंकड़े भी इसी तरफ़ इशारा करते हैं। पहली लोकसभा की बैठकों की संख्या लगभग 135 दिन थी, जबकि हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही का समय काफ़ी कम हो गया है। सीमित सत्र, बार-बार की कार्यवाही स्थगित होना और लगातार हंगामे के बीच अगर क़ानून बन भी जाएँ, तो उसे मज़बूत संसदीय परंपरा नहीं कहा जा सकता। जो सदन संवाद से ज़्यादा टकराव का केंद्र बन जाए, वहाँ अवाम का भरोसा भी कमज़ोर पड़ने लगता है।

हालाँकि यह संकट किसी एक सरकार या किसी एक सियासी पार्टी तक सीमित नहीं है। पिछले तीन दशकों में भारतीय सियासत धीरे-धीरे संसदीय लोकतंत्र से सत्ता-केंद्रित राजनीति की तरफ़ बढ़ी है। सरकारों ने इंतज़ामिया को ज़्यादा ताक़त दी, जबकि विपक्ष ने कई मौकों पर बहस के बजाय गतिरोध की राह अपनाई। नतीजा यह हुआ कि दोनों ने मिलकर उसी इदारे को कमज़ोर किया, जिसकी मज़बूती से जम्हूरियत मज़बूत होती है।

जब क़ानून बनाने वाली संस्था अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं करती, तो आइनी तवाज़ुन बिगड़ना लाज़िमी हो जाता है। इंतज़ामिया के इख़्तियार बढ़ते हैं और अदलिया को ऐसे मामलों में दख़ल देना पड़ता है जो मूल रूप से पार्लियामेंट के दायरे में आने चाहिए। किसी भी परिपक्व लोकतंत्र के लिए यह स्थिति आदर्श नहीं मानी जाती।

मनीष तिवारी द्वारा उठाई गई “बुनियादी सुधारों” की मांग इसी संदर्भ में अहम हो जाती है। इससे सहमति या असहमति अलग बात है, लेकिन इतना तय है कि संसद को अधिक बैठकें, मज़बूत संसदीय समितियाँ, गंभीर बहस और पारदर्शी क़ानून निर्माण प्रक्रिया की ज़रूरत महसूस की जा रही है। जम्हूरियत की असली ताक़त केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि मज़बूत इदारों में होती है।

भारत की सबसे बड़ी ताक़त हमेशा उसका संविधान और उसके लोकतांत्रिक संस्थान रहे हैं, न कि केवल किसी वक़्त की सियासी बहुमत। चुनाव सरकारें बनाते हैं, लेकिन पार्लियामेंट उन्हें संविधान के प्रति जवाबदेह बनाती है। अगर यही इदारा कमज़ोर हो जाए, तो चुनावी प्रक्रिया अपनी तमाम अहमियत के बावजूद महज़ एक रस्मी अमल बनकर रह सकती है।

आख़िर में असली सवाल यह नहीं है कि मनीष तिवारी ने इतने सख़्त अल्फ़ाज़ क्यों इस्तेमाल किए। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपने लोकतांत्रिक इदारों में आती हुई ख़ामोश कमज़ोरी को पहचानने और उसे दूर करने के लिए तैयार है? तारीख़ बताती है कि जम्हूरियतें अक्सर किसी बड़े इंक़लाब से नहीं, बल्कि इदारों की ख़ामोश कमज़ोरी से कमज़ोर पड़ती हैं। अगर पार्लियामेंट सवाल पूछना छोड़ दे, तो जम्हूरियत जवाब देना भी छोड़ देती है।

(नोट: यह एक विचारात्मक/विश्लेषणात्मक लेख है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं।)

लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार, बेंगलुरु

Source: Haqeeqat Times