बेंगलुरु/नई दिल्ली:
बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल फोन और टैबलेट देने की बढ़ती प्रवृत्ति अब गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तथाकथित “डिजिटल रिश्वत” बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर डाल रही है।
बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में नींद की समस्या, बोलने में देरी, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमी और आंखों से जुड़ी परेशानियां तेजी से बढ़ रही हैं।
शुरुआती उम्र में ज्यादा खतरा
विशेषज्ञ बताते हैं कि जन्म से लेकर दो वर्ष की उम्र तक का समय बच्चों के मस्तिष्क विकास के लिए बेहद अहम होता है। इस दौरान मोबाइल और टैबलेट का अत्यधिक उपयोग बच्चों की सीखने की क्षमता और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करता है।
डॉक्टरों की राय
चिकित्सकों का कहना है कि लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों का भाषा विकास बाधित होता है, साथ ही उनमें भावनात्मक असंतुलन और धैर्य की कमी देखी जा रही है। कई मामलों में बच्चों का सामाजिक मेलजोल भी कम हो रहा है।
माता-पिता की मजबूरी
कामकाजी माता-पिता, खासकर महिलाएं, घरेलू जिम्मेदारियों और नौकरी के दबाव के चलते बच्चों को मोबाइल देना आसान विकल्प मान लेती हैं। संयुक्त परिवारों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है।
विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों ने माता-पिता से अपील की है कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करें और इसके बजाय बातचीत, खेल, कहानियां, संगीत और पारिवारिक समय को बढ़ावा दें।
निष्कर्ष
तत्काल राहत के लिए दी जा रही डिजिटल सुविधाएं लंबे समय में बच्चों के भविष्य के लिए खतरा बन सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए स्क्रीन नहीं, बल्कि माता-पिता का समय और ध्यान सबसे जरूरी है।

