अगस्त का महीना शुरू होते ही पूरे देश में देशभक्ति का माहौल दिखाई देने लगता है। गलियों, बाज़ारों, स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों में तिरंगा लहराता है, राष्ट्रगान गूंजता है और “जय हिंद”, “जय भारत” के नारे सुनाई देते हैं। आज़ादी का जश्न मनाना, स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना और देश के प्रति सम्मान व्यक्त करना निश्चित रूप से गर्व की बात है।

लेकिन एक सवाल हम सबको खुद से पूछना चाहिए—क्या देशभक्ति सिर्फ़ झंडा लहराने, राष्ट्रगान गाने और नारे लगाने का नाम है? अगर ऐसा होता, तो वही ज़ुबानें कभी नफ़रत भी फैलाती हैं, वही हाथ रिश्वत लेते हैं, वही लोग पैसों या शराब के बदले वोट डालते हैं, और वही समाज भ्रष्टाचार, हिंसा तथा अन्याय को बढ़ावा देता है।

असल देशभक्ति ईमानदारी, इंसाफ़, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक ज़िम्मेदारी में दिखाई देती है। जब सरकारी दफ़्तरों में बिना रिश्वत काम न हो, महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर खुद को सुरक्षित महसूस न करें, ज़मीन खरीदने के लिए भी कानूनी डर बना रहे, और माफिया तथा भ्रष्टाचार व्यवस्था पर हावी हों, तो सिर्फ़ देशभक्ति के नारे पर्याप्त नहीं हो सकते।

लेख में कहा गया है कि देशभक्ति कोई भाषण नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका है। बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले अगर स्वयं भ्रष्ट आचरण करें, तो बच्चे शब्दों से ज़्यादा व्यवहार से सीखते हैं। इसलिए जो कहते हैं, वही करके दिखाना ही सच्ची देशभक्ति है।

लेखक का मानना है कि सच्चा देशभक्त वही है जिसके दिल में प्रेम, समानता, सहिष्णुता और दूसरों के अधिकारों का सम्मान हो। कानून का पालन करना, ईमानदारी से काम करना, समाज में भाईचारा बनाए रखना और हर नागरिक के सम्मान की रक्षा करना ही असली राष्ट्रप्रेम है।

लेख में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान की अहमियत पर भी ज़ोर दिया गया है। लेखक के अनुसार सच बोलने की हिम्मत हर नागरिक में होनी चाहिए, चाहे वह सत्ता के पक्ष में हो या विपक्ष में। लोकतंत्र में असहमति, सवाल पूछना और शांतिपूर्ण विरोध नागरिक अधिकार हैं, न कि अपराध।

इसी संदर्भ में परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। लेखक का कहना है कि जब मेहनत करने वाले छात्रों का भविष्य पेपर लीक और भ्रष्टाचार की वजह से प्रभावित होता है, तो उनका विरोध केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि अपने भविष्य और मेरिट की रक्षा की आवाज़ है। ऐसे छात्रों की बात सुनी जानी चाहिए और उनके साथ न्याय होना चाहिए।

लेख का संदेश है कि सिर्फ़ तिरंगे को सलाम करना आसान है, लेकिन तिरंगे के नीचे रहने वाले हर नागरिक के अधिकारों, सम्मान और न्याय की रक्षा करना ही सच्ची देशभक्ति है। राष्ट्रगान गाना आसान है, लेकिन हर बच्चे को समान अवसर, मेरिट और इंसाफ़ दिलाना ही उसकी वास्तविक भावना है।

अंत में लेखक कहते हैं कि सच बोलने से डरना नहीं चाहिए। झूठ और दिखावे के शोर के बीच भी सत्य अमर रहता है। सच्ची देशभक्ति वही है जो ईमानदारी, इंसानियत, संविधान, लोकतंत्र और न्याय की रक्षा करे।

“यह हिंदुस्तान है… यही हिंदुस्तान है… और इसे हिंदुस्तान ही रहना है।”

लेखक: शरफुद्दीन सैयद

Source: Haqeeqat Times