तूफानों के बीच उम्मीद का चराग बुझने न देने की दावत
ज़िंदगी में कुछ ऐसे दौर भी आते हैं, जब इंसान जीतने के ख्वाब नहीं देखता, बल्कि सिर्फ़ इतनी दुआ करता है कि किसी तरह टूटने से बच जाए। ऐसे वक्त में ज़िंदा रहना, हौसला कायम रखना, उम्मीद का चराग बुझने न देना और इंसानियत का दामन न छोड़ना ही सबसे बड़ी कामयाबी बन जाता है।
आज हम ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं। हर तरफ़ बेयक़ीनी है, दिलों में खौफ है, चेहरों पर परेशानी है और ज़ेहन पर मायूसी के साए मंडला रहे हैं। मीडिया हर पल हादसों, जंग, क़त्ल, खुदकुशी, मआशी बोहरान और इंसानी अलमियों की खबरें हमारे घरों तक पहुंचा रहा है। ऐसा महसूस होता है जैसे उम्मीद की हर खिड़की धीरे-धीरे बंद होती जा रही हो।
लेकिन तारीख़ गवाह है कि तहज़ीबें सिर्फ़ ताक़त से नहीं, बल्कि उम्मीद से ज़िंदा रहती हैं। कौमें सिर्फ़ हथियारों से नहीं, हौसलों से आगे बढ़ती हैं और इंसान सिर्फ़ सांस लेने से नहीं, बल्कि मकसद के साथ जीने से ज़िंदा रहता है।
यह वक्त शिकायतों का नहीं, बल्कि खुद एहतेसाब का है। किताबें अब सिर्फ़ अलमारियों की ज़ीनत नहीं, बल्कि किरदार की तामीर का ज़रिया बननी चाहिए। बुज़ुर्गों के तजुर्बे, असातिज़ा की रहनुमाई, मुफक्किरों की बसीरत और अज़ीम इंसानों के अफ़कार हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनने चाहिए।
इल्म अगर किरदार में न ढले तो वह सिर्फ़ मालूमात रह जाता है, हिकमत नहीं बनता।
हमें अपने अंदर सोई हुई ताक़त को जगाना होगा। ज़ेहनी इस्तेहकाम पैदा करना होगा। हर बुरी खबर के साथ एक अच्छी सुबह की उम्मीद भी ज़िंदा रखनी होगी। यही वह कैफ़ियत है जिसे क़ुरआन सब्र, फ़लसफ़ा इस्तिक़ामत और ज़िंदगी कामयाबी की पहली सीढ़ी कहती है।
मज़हब दिल को पाकीज़गी देता है, ख़िदमत इंसान को अज़मत अता करती है, संगीत रूह को लतीफ़ बनाता है, अदब एहसासात को जिला़ बख्शता है, साइंस अक़्ल को रोशनी देती है, खेल अज़्म पैदा करते हैं और सियासत अगर ईमानदारी के साथ हो तो समाज की ख़िदमत का बेहतरीन ज़रिया बन सकती है।
लेकिन इन सब से बढ़कर एक क़दर है—इंसानियत।
आज दुनिया में सलाहियतों की कमी नहीं है, लेकिन इंसानियत की कमी ज़रूर महसूस होती है। बड़े-बड़े साइंटिस्ट, उद्योगपति, सियासतदान, अदीब और फ़नकार पैदा हो रहे हैं, लेकिन अगर उनकी कामयाबियां इंसान के दर्द को महसूस न करें, मज़लूम की आवाज़ न बनें और समाज के दुखों में शरीक न हों, तो उनकी अज़मत अधूरी रह जाती है।
बदकिस्मती से हमारा दौर किरदार से ज़्यादा शोहरत का असीर बन चुका है। लोग इंसान के अख़लाक़ से पहले उसके फॉलोअर्स की तादाद देखते हैं। मक़बूलियत को पैमाना बना लिया गया है, जबकि तारीख़ का फैसला हमेशा किरदार के हक़ में हुआ है, शोहरत के हक़ में नहीं।
इसलिए हमें चाहिए कि हम ज़हानत की क़दर करें, सलाहियतों की हौसला-अफ़ज़ाई करें और कामयाबियों का एहतराम करें, लेकिन अपना दिल सिर्फ़ उस इंसान के लिए खोलें जिसके अंदर रहम, आज़िज़ी, ईमानदारी, इंसाफ़ और मोहब्बत ज़िंदा हो।
क्योंकि आख़िरकार इंसान की सबसे बड़ी डिग्री उसकी इंसानियत है, न कि उसकी शोहरत।
आइए, हर नई सुबह के साथ एक नया अहद करें कि हम नफ़रत नहीं, उम्मीद बांटेंगे; खौफ नहीं, हौसला पैदा करेंगे; मायूसी नहीं, ज़िंदगी का पैग़ाम आम करेंगे।
अगर हमने अपने अंदर इंसानियत को ज़िंदा रखा, तो यक़ीन जानिए, हालात कितने ही सख़्त क्यों न हों, हम शिकस्त नहीं खाएंगे।
क्योंकि कभी-कभी ज़िंदगी की सबसे बड़ी फ़तह कोई बड़ा मैदान जीतना नहीं होती, बल्कि तमाम तूफानों के बावजूद एक अच्छा इंसान बने रहना होती है।
लेखक: शरफुद्दीन सैयद, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times

