‘विकसित भारत’ के दावों के बीच ज़मीनी हक़ीक़त का तल्ख़ जायज़ा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर दिल्ली के लाल क़िले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि देश को छोटे ख़्वाब देखने के बजाय बड़े लक्ष्य तय करने चाहिए। उनके मुताबिक़ बड़े ख़्वाब सोच का दायरा वसीअ करते हैं और मज़बूत इरादे मुश्किलों और आफ़तों के बावजूद रास्ता तलाशने में मदद करते हैं।
अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के तेरहवें साल के इस संबोधन में मोदी ने पिछले 12 वर्षों की आर्थिक और औद्योगिक तरक़्क़ी का ज़िक्र करते हुए कहा कि भारत कभी ‘फ्रैजाइल फाइव’ अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होता था, लेकिन अब उनकी क़यादत में दुनिया की तेज़ी से तरक़्क़ी करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
बड़े ख़्वाब देखने की ताकीद करने वाले मोदी ने यह भी कहा कि वर्ष 2047 में जब मुल्क की आज़ादी के 100 साल पूरे होंगे, तब तक भारत एक मुकम्मल तौर पर विकसित राष्ट्र बन जाएगा। अपने ‘विकसित भारत’ के ख़्वाब और योजना की कई बार तारीफ़ कर चुके प्रधानमंत्री ने इस बार भी स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर बड़े-बड़े वादे और दावे किए।
उन्होंने मुल्क के मुस्तक़बिल के इरादों का ज़िक्र करते हुए कहा कि डिफेंस, टेक्नोलॉजी, एनर्जी, इंडस्ट्री और अहम खनिजों समेत मुख़्तलिफ़ शोबों में विदेशी निर्भरता कम करते हुए भारत ख़ुदकफ़ील बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा। ‘सप्तधारा’ विज़न के तहत मुल्क की तरक़्क़ी के लिए सात तरजीही शोबों पर आधारित एक व्यापक रणनीति तैयार करने की बात भी कही गई।
‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ मुहिम के तहत मुल्की पैदावार, स्थानीय उद्योग और हिंदुस्तानी उत्पादों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया गया। नौजवान नस्ल को हुनरमंद और बा-इख़्तियार बनाने तथा उन्हें मुल्क की तरक़्क़ी का मरकज़ी इंजन बनाने के लिए तालीम, ट्रेनिंग, रोज़गार और खेल के मैदान में उनकी सलाहियतों को निखारने की योजनाओं का भी पुरज़ोर ज़िक्र किया गया।
दावों के बरअक्स ज़मीनी हक़ीक़त
ऐन स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले पर्यावरण संरक्षण के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता और युवाओं की तंजीम सीजेपी के सलाहकार सोनम वांगचुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी हुकूमत की कारकर्दगी, तरजीहात और बुलंद-बांग दावों व वादों की रवायत पर सवाल उठाए थे।
उनका कहना था कि मुल्क की मौजूदा सूरत-ए-हाल और जिस तरह की पॉलिसियां अपनाई जा रही हैं, उन्हें देखते हुए कतई ऐसा नहीं लगता कि भारत ‘विकसित भारत’ योजना के तहत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बन पाएगा। उनके मुताबिक़ मौजूदा हालात में ऐसा होना कई एतबार से क़ाबिले-ए-यक़ीन नहीं लगता।
वांगचुक का मानना है कि अपने पड़ोसी मुल्कों—बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और श्रीलंका—के मुक़ाबले भारत की प्रति व्यक्ति आय यानी PCI का अनुपात कम है। कभी ये मुल्क भारत से बहुत पीछे थे, मगर अब कई मामलों में उनकी तरक़्क़ी की रफ़्तार बेहतर दिखाई देती है।
वांगचुक के मुताबिक़ भारत की मौजूदा आर्थिक विकास दर इस बात की निशानदेही करती है कि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का ख़्वाब हासिल करना आसान नहीं होगा। इतना ही नहीं, वैश्विक बाज़ार में दूसरे विकासशील देशों के साथ मुक़ाबला करने की भारत की सलाहियत और ताक़त पर भी इसका असर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर मुल्क के नौजवानों को तरक़्क़ी का मरकज़ और मुख्य प्रेरक बनाना है तो तालीमी निज़ाम में बुनियादी इस्लाह और शफ़्फ़ाफ़ियत लाना बेहद ज़रूरी है। जब तक मुल्क के तालीमी निज़ाम में सुधार नहीं होगा, तब तक लंबे समय की क़ौमी तरक़्क़ी और मुनासिब आमदनी के ज़राए पैदा करना भी मुश्किल रहेगा।
मुल्क में रिश्वतख़ोरी, भ्रष्टाचार और इंतज़ामिया की लापरवाही को ख़त्म करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए वांगचुक ने ‘दूसरी आज़ादी की तहरीक’ शुरू करने की अपील भी की थी। उनका मानना है कि जब तक मुल्क में ईमानदार, मुख़लिस और ज़िम्मेदार क़यादत क़ायम नहीं होगी, तब तक जम्हूरियत की बक़ा और सलामती पर सवाल उठते रहेंगे।
आंकड़ों और ज़मीनी हक़ीक़त में फ़र्क़
मुल्क की तरक़्क़ी के लिए मआशी मंसूबे बनाने की ज़िम्मेदारी पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर-ए-हुकूमत से लेकर यूपीए सरकार तक प्लानिंग कमीशन के पास हुआ करती थी। लेकिन सरकारी इदारों के नाम और इंतज़ामी ढांचे में तब्दीली करना मोदी सरकार की कारकर्दगी की एक ख़ास पहचान रही है। मआशी मंसूबाबंदी और आर्थिक तरक़्क़ी की ज़िम्मेदारी अब नीति आयोग को सौंपी गई है।
नीति आयोग की तरफ़ से सामने आने वाले आंकड़ों को देखें तो कई बार ऐसा महसूस होता है कि सरकारी आंकड़े और ज़मीनी हक़ीक़त एक-दूसरे से काफ़ी मुख़्तलिफ़ हैं।
मुल्क के नौजवानों, ख़ास तौर पर 15 से 28 साल की उम्र के लोगों में बेरोज़गारी का मसला गंभीर बना हुआ है। रोज़गार के लिए जिन क़ाबिलियतों और हुनर की ज़रूरत है, उनके मुक़ाबले में पढ़े-लिखे नौजवानों की सलाहियतें रोज़गार के बाज़ार की ज़रूरतों से पूरी तरह हमआहंग नहीं हैं।
मुल्क में मसाइल की कमी नहीं है। लेकिन इनके हल के लिए जिस संजीदगी, यकसूई, वसीअ नज़रिए, रोशन ख़्याली और रिआया-परवरी के साथ कोशिशें होनी चाहिए थीं, वे नज़र नहीं आतीं। सत्ता की लालच और सियासी मुफ़ाद ने हालात को और पेचीदा बना दिया है।
सबके साथ बराबरी का सुलूक संविधान का बुनियादी उसूल है, लेकिन मौजूदा हुकूमत पर यह इल्ज़ाम लगातार लगाया जाता रहा है कि उसकी तरजीहात इस संवैधानिक रूह के मुताबिक़ नहीं हैं। सरकार पर एक ख़ास मज़हबी विचारधारा को बढ़ावा देने के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में रवादारी और हमआहंगी महज़ उसूल और नारों तक सिमटते नज़र आते हैं।
सरकार बड़े-बड़े दावों और वादों की बातें करती है, लेकिन उसके कामकाज को लेकर क़ौमी और अंतरराष्ट्रीय सतह पर उठने वाले सवालों और तनक़ीद को नज़रअंदाज़ करने की रवायत भी दिखाई देती है। मानो उसूल यही बन गया हो—सबकी सुनो, अपनी करो और अपनी मनमानी को ही अपना हक़ समझो।
ख़ौफ़ और बेयक़ीनी का माहौल
पुरअमन और अमनपसंद अवाम के बीच ख़ौफ़, बेयक़ीनी और बेचैनी का माहौल बढ़ता दिखाई दे रहा है। हुकूमत के तरीक़ा-ए-कार और उसकी तरजीहात पर पार्लियामेंट या किसी दूसरे प्लेटफ़ॉर्म पर सवाल उठाना भी कई बार ‘राष्ट्रविरोध’ के ख़ाने में डाल दिया जाता है।
हुकूमत के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को दबाने के लिए सरकारी एजेंसियों के इस्तेमाल के इल्ज़ाम भी लगातार सामने आते रहे हैं। कोई शख़्स, तंजीम या इदारा सरकार से वज़ाहत मांगता है, किसी पॉलिसी पर सवाल उठाता है या मुख़ालफ़त करता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई किए जाने की शिकायतें आम होती जा रही हैं।
कई मामलों में पुलिस और अदालती निज़ाम के हुकूमत के असर में काम करने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बेगुनाह लोगों के घरों पर बुलडोज़र चलाए जाने के चलन ने भी ख़ौफ़ का माहौल पैदा किया है।
मस्जिदों के नीचे और उनके अहातों में मंदिर तलाश किए जाने के विवाद भी सामने आते रहे हैं। ऐसे हालात में ‘सबका साथ, सबका विकास’ महज़ एक नारा और सियासी जुमला बनकर रह जाने का अंदेशा पैदा होता है।
जब आम आदमी महंगाई, बेरोज़गारी और रोज़मर्रा के मसाइल में घिरा हुआ हो, तब हुकूमत की तरफ़ से विशाल मूर्तियां और भव्य परियोजनाएं खड़ी करने को लेकर भी सवाल उठना फ़ितरी है। ऐसा लगता है कि बड़े-बड़े वादे और दावे करना और अवाम को बेहतर मुस्तक़बिल की ख़ुशफ़हमी में रखना ही हुकूमत की सियासी रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।
एनआरसी, सीएए, यूसीसी और एसआईआर जैसे क़ानूनी और सियासी मसाइल के इस्तेमाल को लेकर भी आम लोगों में बेचैनी और असमंजस पैदा हुआ है। इन क़दमों के ज़रिए आम लोगों को परेशान किए जाने और ख़ौफ़ का माहौल पैदा होने के इल्ज़ाम भी सामने आते रहे हैं।
ऐसे हालात में, जब आम लोगों की ज़िंदगी तरह-तरह के मसाइल में उलझी हुई है और ग़रीबी तथा अमीरी के बीच फ़ासला लगातार बढ़ रहा है, ‘विकसित भारत’ का ख़्वाब ज़मीनी हक़ीक़त से कितना हमआहंग है, यह गंभीर ग़ौर-ओ-फ़िक्र का मौज़ू है।
महंगाई, बेरोज़गारी, अदम-रवादारी, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी और इख़्तियार के ग़लत व बेजा इस्तेमाल के आरोप—ये तमाम तल्ख़ हक़ीक़तें हैं, जो ‘विकसित भारत’ के बड़े-बड़े दावों और वादों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़ा करती हैं।
आख़िर खोखले वादों पर इतना नाज़ कैसा?
लेखक : मोहम्मद आज़म शाहिद, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times


