जनधन, संसदीय जिम्मेदारी और शासकों के खर्च का कड़वा हिसाब
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और सांसदों की भूमिका केवल चुनाव जीतकर सदनों तक पहुंचने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पर यह मूल जिम्मेदारी भी होती है कि वे जनता की समस्याओं को समझें, उनकी आवाज बनें, सरकार से जवाब मांगें और कानून निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं।
दुर्भाग्य से भारत में जनप्रतिनिधित्व की यह मूल भावना धीरे-धीरे कमजोर होती दिखाई दे रही है। चुनाव के दौरान जनता से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं को दूर करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन चुनावी सफलता के बाद अक्सर जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच ऐसी खाई पैदा हो जाती है, जिसे पाटना आसान नहीं होता।
जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी कार्यालयों और नेताओं के दरवाजे के चक्कर लगाती रहती है, जबकि उनके चुने हुए प्रतिनिधि राजनीतिक गतिविधियों, पार्टीगत निष्ठाओं और चुनावी हितों में अधिक उलझे नजर आते हैं।
संसद और विधानसभाएं वास्तव में गंभीर बहस, कानून निर्माण और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के केंद्र होने चाहिए, लेकिन अक्सर ये सदन शोर-शराबे, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और आपसी टकराव की भेंट चढ़ जाते हैं। जनता की समस्याओं पर गहन और परिणामदायक चर्चा के बजाय राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई अधिक प्रमुख दिखाई देती है।
सवाल यह है कि जिन लाखों मतदाताओं ने अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सदनों में भेजा, क्या उनकी वास्तविक आवाज वहां सुनी जाती है?
आज देश बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक असमानता, किसानों की समस्याओं, शिक्षा संकट, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक असंतोष जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे हालात में जनता को उम्मीद थी कि जनप्रतिनिधि अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति संसद के सामने रखते, सरकार से कड़े सवाल करते और नीति निर्माण में गंभीर भूमिका निभाते।
लेकिन दुर्भाग्य से अनेक प्रतिनिधियों की गतिविधियां केवल चुनावी राजनीति, सभाओं, नारों और राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित होकर रह गई हैं।
एक बड़ी समस्या यह भी है कि जनता अपने प्रतिनिधियों के संसदीय प्रदर्शन से पूरी तरह परिचित नहीं होती। कितने सवाल उठाए गए? कितनी बहसों में भाग लिया गया? अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए क्या कदम उठाए गए? जनता की समस्याओं के समाधान के लिए कौन-कौन से प्रयास किए गए? ये सभी सवाल हर चुनाव से पहले जनता को अपने प्रतिनिधियों से जरूर पूछने चाहिए।
लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं, बल्कि लगातार जवाबदेही सुनिश्चित करने की व्यवस्था है। यदि जनता अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगना छोड़ दे तो प्रतिनिधित्व की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ जाती है।
जरूरत इस बात की है कि जनता व्यक्तित्व, धर्म, जाति, बिरादरी और भावनात्मक नारों से ऊपर उठकर अपने प्रतिनिधियों के वास्तविक प्रदर्शन का मूल्यांकन करे। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में एक सक्रिय, जागरूक और जिम्मेदार संसद ही जनता की समस्याओं के समाधान की उम्मीद बन सकती है।
लेकिन यह कैसे संभव होगा, जहां संसद में प्रधानमंत्री जवाबदेही के लिए उपस्थित नहीं होते? एक ओर संसद की कार्यवाही चलती रहती है और दूसरी ओर सत्ताधारी विदेश दौरों पर होते हैं या देश में रहकर भी संसद की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेते और न ही उसे अपेक्षित महत्व देते हैं।
जनप्रतिनिधियों को भी समझना होगा कि संसद की सदस्यता कोई सम्मान या सुविधाएं हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि एक महान सार्वजनिक जिम्मेदारी है।
अब समय आ गया है कि देश की जनता अपने प्रतिनिधियों से केवल वादे नहीं, बल्कि उनके काम का हिसाब मांगे। क्योंकि एक मजबूत लोकतंत्र केवल अच्छे शासकों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि जिम्मेदार जनता और जवाबदेह जनप्रतिनिधियों पर भी निर्भर करता है।
सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के धन का कितना उपयोग?
भारत में स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति देने के लिए वर्ष 1993 में सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) शुरू की गई थी। इस योजना के तहत देश के प्रत्येक निर्वाचित सांसद को अपने निर्वाचन क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों और विकास कार्यों के लिए प्रतिवर्ष पांच करोड़ रुपये का फंड दिया जाता है।
इस योजना के नियम स्पष्ट हैं। इस राशि का उपयोग केवल सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निर्माण तथा सरकारी भूमि और सरकारी नियंत्रण वाले संस्थानों के लिए किया जा सकता है। वर्ष 2011-12 से प्रत्येक सांसद के लिए यह राशि पांच करोड़ रुपये प्रतिवर्ष निर्धारित है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे सांसद इस भारी-भरकम फंड का सही उपयोग कर रहे हैं?
हालिया आंकड़े जो कहानी बताते हैं, वे काफी निराशाजनक हैं। 18वीं लोकसभा (2024-2029) और राज्यसभा के कुल 745 सांसदों के लिए योजना के तहत कुल 11,544 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है, लेकिन इस भारी भरकम बजट में से अब तक पूरे देश में केवल 3,539.8 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। इसका सीधा अर्थ है कि कुल आवंटित फंड का केवल 30.7 प्रतिशत हिस्सा ही विकास कार्यों पर खर्च हुआ है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, 18वीं लोकसभा के 27 मई 2026 तक सभी 543 मौजूदा सांसदों के लिए योजना के तहत कुल 8,265 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, लोकसभा सांसदों ने अब तक कुल 88,790 सार्वजनिक कार्यों की सिफारिश की है, जिनकी अनुमानित लागत लगभग 4,787 करोड़ रुपये है। इनमें से 67,524 कार्यों को मंजूरी दी गई, जिनकी लागत लगभग 3,547 करोड़ रुपये है। हालांकि, अब तक केवल 21,807 कार्य ही पूरे हो सके हैं, जिनकी लागत लगभग 1,047 करोड़ रुपये है।
एम्पावर्ड इंडियन की रिपोर्ट के अनुसार, 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन में काफी अंतर है। पूर्वोत्तर राज्यों के सांसदों ने फंड का सबसे बेहतर उपयोग किया है।
नागालैंड पूरे देश में शीर्ष पर है, जहां आवंटित राशि का 82.3 प्रतिशत खर्च किया जा चुका है। 35.4 करोड़ रुपये के आवंटन में से 29.1 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
इसके बाद मिजोरम 73.8 प्रतिशत उपयोग के साथ दूसरे स्थान पर है। वहां 31.9 करोड़ रुपये में से 23.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
शीर्ष पांच राज्यों में मेघालय 63.9 प्रतिशत, सिक्किम 63.3 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश 62.8 प्रतिशत के साथ शामिल हैं।
बड़े राज्यों की स्थिति भी विशेष रूप से उत्साहजनक नहीं है। उत्तर प्रदेश ने अपने फंड का 45.8 प्रतिशत उपयोग किया है। वहां 1,776.7 करोड़ रुपये में से 814.6 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
वहीं झारखंड ने 42.4 प्रतिशत, बिहार ने 39.7 प्रतिशत, पंजाब ने 38.3 प्रतिशत और मध्य प्रदेश ने 37.3 प्रतिशत फंड खर्च किया है।
सबसे कम प्रदर्शन करने वाले बड़े राज्यों में ओडिशा 13.2 प्रतिशत, महाराष्ट्र 17.3 प्रतिशत और केरल 17.3 प्रतिशत के साथ शामिल हैं।
सबसे खराब प्रदर्शन केंद्र शासित प्रदेशों का रहा है। दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव में फंड का उपयोग शून्य प्रतिशत रहा। 39.2 करोड़ रुपये के फंड में से एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया।
लद्दाख ने मात्र 3.7 प्रतिशत, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह ने 6.9 प्रतिशत, जबकि देश की राजधानी दिल्ली और चंडीगढ़ ने केवल 9.5 प्रतिशत फंड का उपयोग किया है।
कई सांसदों ने एक रुपये भी खर्च नहीं किए
व्यक्तिगत प्रदर्शन की बात करें तो बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं। 54 सांसदों ने अपने फंड से एक रुपया भी खर्च नहीं किया, जबकि कई प्रमुख सांसदों का खर्च एक प्रतिशत से भी कम रहा।
एम्पावर्ड इंडियन की रिपोर्ट के अनुसार, सिकंदराबाद से सांसद जी. किशन रेड्डी को 14.7 करोड़ रुपये का फंड मिला, लेकिन उन्होंने केवल चार लाख रुपये यानी 0.3 प्रतिशत खर्च किए।
कल्याण से सांसद श्रीकांत एकनाथ शिंदे ने 14.7 करोड़ रुपये में से केवल 3.25 लाख रुपये यानी 0.2 प्रतिशत खर्च किए।
जोधपुर, राजस्थान से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत ने 14.7 करोड़ रुपये में से केवल 4.91 लाख रुपये यानी 0.3 प्रतिशत खर्च किए।
बुलढाणा से प्रतापराव जाधव का 0.8 प्रतिशत और हरियाणा से राज्यसभा सांसद कार्तिकेय शर्मा का 0.6 प्रतिशत खर्च भी बेहद खराब प्रदर्शन को दर्शाता है।
इसके विपरीत, कुछ सांसदों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में 80 प्रतिशत से अधिक फंड खर्च किया है। इनमें अरुण कुमार सागर 87.3 प्रतिशत, मिथिलेश कुमार 87.1 प्रतिशत, गीता उर्फ चंद्रप्रभा 85.5 प्रतिशत और जावेद अली खान 81.1 प्रतिशत शामिल हैं।
मिजोरम के वनलालवेना 84.7 प्रतिशत और नागालैंड की एस. फांगनोन कोन्याक 84.0 प्रतिशत खर्च के साथ बेहतर प्रदर्शन करने वाले सांसदों में शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि इस योजना के तहत 12 श्रेणियों में 112 प्रकार के कार्यों की अनुमति है। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि 71 प्रतिशत कार्य केवल तीन प्रमुख क्षेत्रों तक सीमित रहे।
बिजली क्षेत्र में सबसे अधिक 23,440 सिफारिशें यानी 26.4 प्रतिशत की गईं, जिनमें अधिकांश स्ट्रीट लाइट लगाने से संबंधित हैं। सड़क और पुल से जुड़े 21,475 कार्य यानी 24.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहे।
सांसदों का खराब प्रदर्शन और प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर खर्च
एक ओर जहां जनता के प्रतिनिधि और सांसद अपने विकास फंड के उपयोग में निराशाजनक प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरों पर एक साल में 74 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरों पर हुए खर्च का विवरण संसद में पेश किया है।
विदेश मंत्रालय ने हाल ही में राज्यसभा में बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर वर्ष 2026 में अब तक लगभग 74.58 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के संजय सिंह और सीपीआई(एम) के डॉ. वी. शिवदासन ने प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों से संबंधित अतारांकित प्रश्न संख्या 2172 पूछा था।
सांसदों ने वर्ष 2021 से अब तक हर वर्ष और प्रत्येक दौरे के हिसाब से हुए खर्च, हस्ताक्षरित समझौतों और देश में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से संबंधित विवरण मांगा था।
इसके जवाब में विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने लिखित उत्तर में बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के वर्ष 2021 से जुलाई 2026 तक के विदेशी दौरों पर 550 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए।
वहीं वर्ष 2026 में अब तक लगभग 74.58 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
मई 2026 में नॉर्वे का दौरा 17.46 करोड़ रुपये के खर्च के साथ सबसे महंगा रहा। इसके बाद इजरायल के दौरे पर 11.92 करोड़ रुपये, सेशेल्स पर 8.22 करोड़ रुपये, स्वीडन पर 6.33 करोड़ रुपये, मलेशिया पर 5.57 करोड़ रुपये और न्यूजीलैंड के दौरे पर 5.44 करोड़ रुपये खर्च हुए।
वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों पर कुल 187.83 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो पिछले वर्षों में सबसे अधिक था।
इस वर्ष प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस, अमेरिका, मॉरीशस, थाईलैंड सहित 23 देशों की यात्रा कर चुके हैं।
सांसदों पर आपराधिक मामले भी गंभीर चिंता का विषय
सांसदों के बीच बड़ी संख्या में ऐसे सदस्य भी हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।
भारत में 326 मौजूदा सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया की ओर से पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, यह संख्या देश के लगभग 45 प्रतिशत मौजूदा सांसदों के बराबर है।
सदन के अनुसार मामलों की स्थिति इस प्रकार है:
- लोकसभा: 543 सांसदों में से 251 सांसद, यानी लगभग 46 प्रतिशत, आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।
- राज्यसभा: 233 सांसदों में से 75 सांसदों के खिलाफ मामले लंबित हैं।
रिपोर्ट के अनुसार इन सांसदों पर गंभीर और सामान्य अपराधों सहित कुल 4,192 लंबित आपराधिक मामले चल रहे हैं।
इनमें 210 सांसद ऐसे हैं जिन पर अत्यंत गंभीर प्रकृति के आरोप हैं, जिनमें हत्या का प्रयास, हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे मामले शामिल हैं। इन अपराधों में दोष सिद्ध होने पर पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा हो सकती है।
राजनीतिक दलों के स्तर पर देखें तो भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) दोनों के कई निर्वाचित सांसद इन मामलों का सामना कर रहे हैं।
अब जनता को अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभानी होगी
यह है संसद और वहां मौजूद जनप्रतिनिधियों की वर्तमान स्थिति। अब समय आ गया है कि जनता मूकदर्शक बने रहने के बजाय अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाए।
केवल हर पांच वर्ष में वोट डाल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधियों की लगातार जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
जनता के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना होनी चाहिए।
अपने क्षेत्र के सांसद और विधायक के प्रदर्शन का नियमित रिकॉर्ड रखा जाए। यह देखा जाए कि उन्होंने संसद या विधानसभा में कितने सवाल उठाए, किन बहसों में भाग लिया और अपने निर्वाचन क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए क्या व्यावहारिक कदम उठाए।
हर क्षेत्र में जागरूक नागरिकों, शिक्षकों, वकीलों, पत्रकारों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मिलाकर गैर-पक्षपाती जनमंच बनाए जाने चाहिए, जो स्थानीय समस्याओं की सूची तैयार करें और उन्हें चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने नियमित रूप से रखें।
जनता को अपने प्रतिनिधियों से समय-समय पर मुलाकात, जनसुनवाई और जवाबदेही कार्यक्रम आयोजित करने की मांग करनी चाहिए।
प्रतिनिधि को यह एहसास होना चाहिए कि चुनावी सफलता का अर्थ जनता से संबंध समाप्त होना नहीं, बल्कि जनता के सामने लगातार जवाबदेह रहने की जिम्मेदारी है।
सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया का इस्तेमाल केवल राजनीतिक नारेबाजी के लिए करने के बजाय जनता की समस्याओं, प्रतिनिधियों की उपस्थिति, प्रदर्शन और चुनावी वादों की समीक्षा के लिए किया जाना चाहिए।
हर बड़े वादे के साथ जनता को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि वादा कब पूरा होगा और इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
इसी तरह आगामी चुनावों में वोट जाति, धर्म, बिरादरी, व्यक्तिपूजा या भावनात्मक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार की ईमानदारी, क्षमता, जनसेवा और पिछले प्रदर्शन को देखकर दिया जाना चाहिए।
युवाओं को विशेष रूप से राजनीतिक जागरूकता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति शिक्षित किया जाना चाहिए, क्योंकि एक जागरूक पीढ़ी ही भविष्य में बेहतर नेतृत्व का चुनाव कर सकती है।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता के हाथ में होती है। जब जनता सवाल पूछना शुरू करेगी, वादों का हिसाब मांगेगी, प्रतिनिधियों के प्रदर्शन का रिकॉर्ड रखेगी और अपने मत का सोच-समझकर इस्तेमाल करेगी, तभी जनप्रतिनिधित्व अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर लौट सकेगा।
इसलिए आज प्रत्येक क्षेत्र की जनता का साझा संकल्प होना चाहिए कि वोट सोच-समझकर देंगे और चुने हुए प्रतिनिधि से उसके काम का हिसाब मांगेंगे।
(लेखक प्रसिद्ध पत्रकार, स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
नोट : लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। संस्था/समाचार पत्र का लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।
लेखक : सरफराज अहमद कासमी
Source: Haqeeqat Times

