भारत में सार्वजनिक जीवन और राजनीति का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है। नफ़रत अब कोई अचानक भड़कने वाली भावना या इक्का-दुक्का घटनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह व्यवस्थित, सामान्य और स्वीकार्य सामाजिक प्रवृत्ति बनती जा रही है। राजनीति, प्रशासन, मीडिया और समाज — सभी स्तरों पर यह चुपचाप जगह बना चुकी है।
जो बातें कभी पूरे समाज को झकझोर देती थीं, वे अब सामान्य खबर बनकर रह गई हैं। नफ़रत न तो अब शोर मचाती है और न ही व्यापक विरोध पैदा करती है। धीरे-धीरे इसे समझने योग्य, जायज़ और अपरिहार्य बताकर स्वीकार किया जाने लगा है। यह बदलाव किसी एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्राथमिकताओं, संस्थागत चुप्पी, चुनिंदा कानूनी कार्रवाइयों और सामाजिक उदासीनता का नतीजा है।
अमेरिका स्थित इंडिया हेट लैब के आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में भारत में 1,318 नफ़रत से जुड़ी घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 2024 में यह संख्या 1,165 और 2023 में 668 थी। यह सिर्फ आंकड़ों की बढ़ोतरी नहीं, बल्कि समाज में गहराई तक उतरती मानसिकता का संकेत है। खास बात यह है कि ऐसी कई घटनाएं उन राज्यों में सामने आईं, जहां वैचारिक राजनीति का दबदबा है।
नफ़रत अब केवल सड़कों या हिंसक घटनाओं तक सीमित नहीं है। इसका असर संस्कृति, कला और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी साफ दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त संगीतकार ए. आर. रहमान का यह कहना कि दशकों की सफलता के बावजूद उन्हें बॉलीवुड में आज भी ‘बाहरी’ महसूस कराया जाता है, इस बढ़ती पहचान-आधारित असहिष्णुता का प्रतीक है।
जब विविधता को ताक़त नहीं बल्कि खतरा समझा जाने लगे, तो इसका असर केवल हिंसा तक सीमित नहीं रहता। भाषा, साहित्य, संगीत और विचारों की स्वतंत्रता भी सिमटने लगती है। संवाद की जगह चुप्पी ले लेती है और सवाल उठाना अपराध समझा जाने लगता है।
इस पूरे माहौल का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि नफ़रत को कानून-व्यवस्था, राष्ट्रवाद और सुरक्षा के नाम पर正 ठहराया जा रहा है। जब कानून पहचान के आधार पर काम करने लगे, जब जांच से पहले ही दोष तय कर दिया जाए और न्याय सज़ा का औज़ार बन जाए, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि एक गंभीर नैतिक संकट होता है। नफ़रत तब सबसे ताक़तवर होती है, जब वह “सामान्य” बना दी जाती है।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में बेहद अहम है। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और असमानता जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान हटाकर पहचान-आधारित विवादों को प्रमुखता दी जाती है। हत्याओं को “झड़प”, लक्षित हिंसा को “तनाव” और नफ़रत भरे भाषणों को “कड़ी राय” कहकर पेश किया जाता है। इससे हिंसा एक नैतिक झटके के बजाय रोज़मर्रा की खबर बन जाती है।
इस स्थिति के लिए केवल राजनीतिक नेतृत्व ही ज़िम्मेदार नहीं है। समाज की चुप्पी, मध्यम वर्ग की उदासीनता और कमज़ोर विपक्ष भी नफ़रत को फलने-फूलने का अवसर देते हैं। जब नफ़रत को चुनावी मजबूरी मान लिया जाता है, तो उसे रोकने की ताक़त भी खत्म हो जाती है।
इतिहास गवाह है कि नफ़रत कभी एक समूह तक सीमित नहीं रहती। जो आज “दूसरों” के लिए गढ़ी जाती है, वही कल पत्रकारों, छात्रों, कलाकारों और असहमति रखने वालों पर लागू हो जाती है।
आज भारत के सामने असली सवाल यह नहीं है कि नफ़रत मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इसे राजनीतिक औज़ार के रूप में स्वीकार किया जाएगा या लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवीय गरिमा और सामाजिक सौहार्द के खिलाफ खड़ा होकर चुनौती दी जाएगी।
नफ़रत को हराने के लिए केवल कानून या भाषण काफी नहीं हैं। इसके लिए ज़रूरी है —
समावेशी राजनीति,
जवाबदेह और स्वतंत्र पत्रकारिता,
विविधता को अपनाने वाली शिक्षा,
और सबसे बढ़कर एक ऐसा समाज, जो मतभेद को दुश्मनी में बदलने से इनकार करे।

लेखक: अब्दुल हलीम मंसूर
Source : Haqeeqat Times ( Translated in hindi)

